मुझे देखने से पहले साफ़ कर... अपनी आँखों की पुतलियाँ ग़ालिब...
कहीं ढक ना दे मेरी अच्छाइयों को भी..नज़रों की ये गन्दगी तेरी.
बस यहीं काम हैं...फ़ुर्सत भी बोहोत हैं...
तुम हमारे...हम तुम्हारे...ऐब ढुंढते हैं..
सर-ऐ-आम ये शिकायत है ज़िन्दगी से,
क्यूँ मिलता नहीं मिजाज मेरा किसी से...
चल रहे है जमाने में रिश्वतो के सिलसिले ........
तुम भी कुछ ले~दे कर, मोहब्बत कर लो.....!!!!
कहने वालों का कुछ नहीं जाता,
सहने वाले कमाल करते हैं
कौन ढूंढें जवाब दर्दों के,
लोग तो बस सवाल करते हैं'
गए है जबसे शहर में कमाने को लड़के ,
हमारे गाँव में त्यौहार भी नहीं आते।
---------
बस यूँ ही लिखता हूँ .. वजह क्या होगी ..??
राहत ज़रा सी ..
आदत ज़रा सी ..!