Shayri (Continued)

आबिद आलमी की एक और गजल

खदशों की नगरी में जिन्दा रहने का गुर जान लिया है

यानी खुद को चलती फिरती लाशें हमने मान लिया है

उसके खफा रहने का बाईस कोई हाथ नहीं आ पाया

अपने अहसासात का आलम सारा हमने छान लिया है

उसको सहा है सदियों यानी अब कोई बहरूप भरे वो

उसके हर अंदाज को हमने अच्छी तरह पहचान लिया है

आने वाली नस्लें बरसों इस सौदे पर नाज करेंगी

हमने समंदर से किश्ती के बदले में तूफ़ान लिया है

बाद -ए -सबा की खामोशी अब तोड़ नहीं पायेगा कोई

रात को बस्ती क्यों चीखी थी इसने अब ये जान लिया है

मुमकिन है अब इसका दमन भर दे दरिया की तुगयानी

आबिद अब सहरा का रस्ता बादल ने पहचान लिया है
 
प्रो . चसवाल उर्फ़ आबिद आलमी

हरयाणा की एक हस्ती जिसने कालेज के प्राध्यापकों के आन्दोलन को एक अहम मौके पर दिशा देने में अहम् भूमिका निभाई । शायरी और गजल को हरयाणा में एक नए मुकाम पर पहुंचाया । उनकी अस्सी वर्षगांठ के उपलक्ष्य में 30.6.2013 को एक मुशायरे का आयोजन किया जा रहा है । आप सब उसमें आमंत्रित हैं । जगह और बाकी सूचना जल्दी ही प्रेषित की जा रही है ।




शहर में खोटा खरा क्या है , कोई समझाय तो

किसका सिक्का चल रहा है कोई ये बतलाय तो


शाम को सब लोग घर आयें तो कहते हैं ये

दिन तो जूं तूं कट गया , रत भी कट जाय तो

सुबह के जलवे हकीकत हैं , कोई किस्से नहीं

रात का पर्दा कोई बढ़कर , जरा सरकाय तो

वो अगर बिगड़ेगा उसका रूप कुछ निखरेगा और

उसके होंठों पर किसी सूरत मेरा नाम आए तो

क्या कहा जितना चलें बढ़ सकती है उतनी उधर

और अगर मंजिल सरक कर पांव में आ जाय तो

खम तो रखेंगे इए हम रत दिन और सुबह -ओ -शाम

सर है लेकिन , थक भी सकता है , कहीं उठ जाय तो

सुनने वालों का कहाँ है जिक्र आबिद ये बता

बात कुछ भी हो कोई कहते हुए शरमाय तो
 
जिंदगी का बोझ ढोते ढोते जब हम थक गए

उनकी नजरों में न जाने कैसे कैसे शक गए


एक लहजा बर्फ पर थे , एक लहजा आग पर

पांव ने फितरत समझ ली राह की और पक गए

खोखले वायदों को दोहराना तेरी आदत सही

कान तो लोगों के लेकिन सुनते सुनते पक गए

बैठे बैठे सहते कब तक राह की तानाजनी

लोग उठकर चल दिए और एन मंजिल तक गए

घर के खाली बर्तनों में झांकते भी कब तलक

बच्चे आखिर सो गए जब रोते रोते थक गए

पूछ मत सूरज को हमने देखा कैसी आंख से

रास्ते सारे हमारे बर्फ से जब ढ़क गए

एक वो आबिद सफ़र में रहके भी ताजा मिजाज

एक ये हम रास्ते में बैठे बैठे थक गए
 
जब सत्य निष्प्राण हो, विधर्मी का कल्याण हो !

सत्य हो डरा हुआ, और असत्य को प्रणाम हो !

जाट तुम झुको नहीं, युद्ध से डरो नहीं !

जब शौर्य हो झुका हुआ, घुटनों पर टिका हुआ !

दम तोड़ता हो न्याय जब, बैसाखियो पर खड़ा हुआ !

जाट तुम झुको नहीं, युद्ध से से डरो नहीं !

जब साथ में न मित्र हो, उनका व्यवहार भी विचित्र हो !

चित्कारती धरा दिखे, और मान देश का खंड खंड हो !

जाट तुम झुको नहीं, युद्ध से डरो नहीं !

गगन तक न चिंघाड़ हो, और शत्रु को न ललकार हो !

शीश काट आतताई का, और न माँ भारती की जयकार हो !

तब तक वीर जाट तुम रुको नहीं !

जाट तुम झुको नहीं, बहे क्यों न शोणित की नदी !

पर युद्ध से डरो नहीं, वीर जाट तुम रुको नहीं !
 
तुम चलो साथ तो आहट भी न होने पाए ,
दरमियां हम भी न हों यूँ तुम्हे कितना चाहें ||
 
इतना करीब आके भी क्या जाने किस लिए,
कुछ अजनबी से आप हैं, कुछ अजनबी से हम।
 
उम्र भर चलते रहे,
मगर काँधों पे आये
शमशान तक......
बस दस कदम के वास्ते,
बहुतो का अहसान हो गया !!
 
कमाले बुज़दिली है अपनी ही आंखों में पस्त होना |
गर ज़रा सी जूरत हो तो क्या कुछ हो नहीं सकता ||

उभरने ही नहीं देती यह बेमाइगियां दिल की |
नहीं तो कौन सा कतरा है, जो दरिया हो नहीं सकता ||


-भगत सिंह
 

या भी खूब रही -----

ये सोच कर की शायद वो खिड़की से झाँक ले,

उसकी गली के बच्चे आपस में लड़ा दिए मैंने !!
 

या भी खूब रही -----

ये सोच कर की शायद वो खिड़की से झाँक ले,

उसकी गली के बच्चे आपस में लड़ा दिए मैंने !!

ye to bhaut galat kaam kiya aapne .... bachpan ki shararten karne ki aadat gayi nahi bhai saab aapki .. :P:P
 
लू के थपेड़ो के बीच ठंडी हवा का झोका
अच्छा लगता है |
कभी -२ किसी की हँसी की खातिर झूट भी
सच्चा लगता है |
यु तो समय की आंधियो में झुर्रियो के साथ
पाक चुके है बाल भी |
फिर भी कही किसी कोने में अपना दिल भी
बच्चा लगता है |
 
तुम्हें गैरों से कब फुर्सत, हम अपने गम से कब खाली
चलो बस हो चुका मिलना, न तुम खाली, न हम खाली।
 
किसी खातून ने कुछ यों कहाँ फेसबुक पर मायूसी के अंदाज़ में :

देखती हूँ तस्वीर-ए- यार तो होता है रश्क
हर बात लाजवाब थी अगर बेवफा ना होता

हमने उसे कुछ यों समझाया अपने ही अंदाज़ में :

न करो इश्क खूबसूरत तश्वीरों से ए नाज़नीन,
खूबसूरती से वफ़ा का मेल नहीं कर लो जरा यकीन
क्यों बहलते हो कदकाठी गौरे रंग और लिबास से
भरमाते हैं छिछोरे ठगते हैं हुश्न को बोली के मिठास से
 
दिल का क्या है ये तो उनकी यादों के सहारे जी लेगा,
बात तो इन आँखों की है जो उनके दीदार को तरसतीं हैं.
 
बोतल पे बोतल पीने से क्या फायदा, रात गुज़रे तो उतर जायेगी |
सिर्फ एक बार किसी की बेवफाई पियो, उम्र सारी नशे में गुजर जायेगी ||
 
काश ये दिल अपने इख्तियार में होता,
ना किसी की याद आती ना किसी से प्यार होता
 
अध् खुले दरबाजे के पीछेसेजब भी झाँकी आधी तुम
किसी कीआहट से घबरा के जब भी वापस भागी तुम
माथे पर अब जो आये पसीना उसे पोंछती पल्लू से,
आँख उनींदी मुरझाया चेहरा लगे सारी रैना जागी तुम.
 
आज के कुल को डुबोने वाले cool duds को समर्पित लाइनें:-


प्यार में दौलत सारी ना लुटा देना,


मम्मी पापा के सपने धूल में ना मिला देना।
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घर से मिले हैं पैसे सब्जी के लिए बेटा,
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बाज़ार जा कर गर्लफ्रेंड का रिचार्ज ना करा देना।
 
वो एक रात जला तो उसे चिराग कह दिया |
हम बरसो से जल रहे हैं कोई तो खिताब दो ||
 
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