ravinderjeet
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आबिद आलमी की एक और गजल
खदशों की नगरी में जिन्दा रहने का गुर जान लिया है
यानी खुद को चलती फिरती लाशें हमने मान लिया है
उसके खफा रहने का बाईस कोई हाथ नहीं आ पाया
अपने अहसासात का आलम सारा हमने छान लिया है
उसको सहा है सदियों यानी अब कोई बहरूप भरे वो
उसके हर अंदाज को हमने अच्छी तरह पहचान लिया है
आने वाली नस्लें बरसों इस सौदे पर नाज करेंगी
हमने समंदर से किश्ती के बदले में तूफ़ान लिया है
बाद -ए -सबा की खामोशी अब तोड़ नहीं पायेगा कोई
रात को बस्ती क्यों चीखी थी इसने अब ये जान लिया है
मुमकिन है अब इसका दमन भर दे दरिया की तुगयानी
आबिद अब सहरा का रस्ता बादल ने पहचान लिया है
खदशों की नगरी में जिन्दा रहने का गुर जान लिया है
यानी खुद को चलती फिरती लाशें हमने मान लिया है
उसके खफा रहने का बाईस कोई हाथ नहीं आ पाया
अपने अहसासात का आलम सारा हमने छान लिया है
उसको सहा है सदियों यानी अब कोई बहरूप भरे वो
उसके हर अंदाज को हमने अच्छी तरह पहचान लिया है
आने वाली नस्लें बरसों इस सौदे पर नाज करेंगी
हमने समंदर से किश्ती के बदले में तूफ़ान लिया है
बाद -ए -सबा की खामोशी अब तोड़ नहीं पायेगा कोई
रात को बस्ती क्यों चीखी थी इसने अब ये जान लिया है
मुमकिन है अब इसका दमन भर दे दरिया की तुगयानी
आबिद अब सहरा का रस्ता बादल ने पहचान लिया है