Shayri (Continued)

जलेगा सुबह तलक या हवा बुझा देगी
ये सोचता ही नहीं मैं दिया जलाते हुए..
 
वो एक रात जला तो उसे चिराग कह दिया |
हम बरसो से जल रहे हैं कोई तो खिताब दो ||

एक रात जो जले उस्से चिराग कहते हैं ,
सदिओं जलने वालों को महताब कहते हैं ॥ ----रवि "अतृप्त"
 
खुदा की रहमतों का जिक्र करते हैं इन्सां सभी,
मगर इन्सानियत की कद्र करता नहीं हर कोई !
 
न रखें हरदम रिश्तों की मुंडेर पर सयानेपन का 'दीपक'
शैतानियाँ बच्चों-सी भी अक्सर काम आती हैं दोस्तों !
 
हर बात पे रंजिश हर बात पे 'हिसाब'
फ़क़त हमने 'इश्क' नहीं, 'नौकरी' कर ली हो जैसे
 
मुझे दुश्मन से भी खुद्दारी की उम्मीद रहती है,
किसी का भी हो सिर, कदमों में अच्छा नहीं लगता !!
ये क्यों बाकी रहे आतिशजनो इसे भी जला डालो,
कि सब हो बेघर और मेरा हो घर अच्छा नहीं लगता
 
तुझपे चाहतो की इन्तहा की थी मैंने,
बता तुझे किसी और का होने की ज़रूरत क्या थी |
 
बेवफाई तो यहाँ सभी करते हैं,
तुम तो समझदार थे कुछ तो नया करते |
 
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ये जो मेरी जान जायेगी ना, इस मोहब्बत में |
यूँ समझना तेरा सदका दिया है, नज़र उतारी है तेरी ||


 
"तूफानों की मार झेल कर छप्पर उठा रहा है देश,
मालिक! तेरी ताक़त देखी, अब तू मेरी हिम्मत देख!"
 
Aansu na hote to aankhe
itni khubsurat na hoti.....
Dard na hota to khushi ki
kimat na hoti.....
Agar mil jate chane se har
koi to.......
Duniya me Rab ki Zarurat na hoti.....
 
थी खता उनकी मगर जब आ ही गये वो सामनें |
झुक गयीं मेरी भी आँखे रस्म-ए-उल्फ़त देखिये ||
 
आओ किसी शब मुझे टूट के बिखरते देखो,
मेरी रगो में ज़हर जुदाई का उतरता देखो |
किस किस अदा से तुझे माँगा है खुदा से,
आओ कभी मुझे सजदों में सिसकता देखो ||
 
किताबो के पन्ने पलट कर सोचता हूँ, यूँ जिन्दगी पलट जाये तो क्या बात होती |
तमन्ना जो पूरी हो ख्वाबो में , वो हकीकत बन जाये तो क्या बात होती |
कुछ लोग मतलब के लिये ढूंढते है मुझे, बिन मतलब कोई आये तो क्या बात होती |
कत्ल करके तो सब ले जायेंगे दिल मेरा, कोई प्यार से जीत कर ले जाये तो क्या बात होती |
 
कसूर उन कश्तियों का नहीं जो मझधार में उलझ गयी ...
ये तो कुछ झोके चले थे फिजाओं के .. साहिलों से ग़ालिब ...
 
बदले यू रंग आपने हैरत हुई मुझे |
गिरगिट को मात दे गयी फितरत जनाब की ||
 
माचिस की तीलियाँ भी अब तो बेकार हैं..

आदमी ही आदमी से जलने को तैयार है !!
 
खैरात में मिली खुशियाँ तुम्हें मुबारक ......
में तो अपने ग़मों में रहता हूँ बादशाहों कि तरह ,,!!
 
"ले रहा था 'मोहब्बत' के बाज़ार से 'इश्क' की चादर,
लोगों के हुजूम से आवाज आई 'साहिब' आगे से 'कफ़न' भी लेना"..
 
माना कि मरने वालो को भुला देते है सभी ,
मुझ जिंदा को भूलकर तुमने तो रिवायत ही बदल दी |

 
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