Shayri (Continued)

और तो कौन है जो मुझको तसल्ली देता |
हाथ रख देती हैं दिल पर तेरी बातें अक्सर ||
 
"जिंदगी ये तो नहीं तुझको संवारा ही न हो
कुछ न कुछ तेरा एहसान उतारा ही न हो।

शर्म आती है कि उस शहर में हम हैं, कि जहां
न मिले भीख, तो लाखों का गुजारा ही न हो"
 
घुटने लगी अवाम की आवाज़ किसलिए
पहना दिये हैं पत्थरों को ताज किसलिए
चेहरों के डर से आईने छुपने लगे हैं अब
बदला हुआ है वक़्त का अंदाज़ किसलिए
जो फुर्सतों में तय हुआ मेरे तुम्हारे बीच
खुलने लगा हरेक पे वो राज़ किसलिए
नग़मों के बादशाह ज़रा खुलकर बता हमें
टूटा हुआ है हाथ में ये साज़ किसलिए
अरसे तलक जो पनघटों के पास ही रहा
वो बूंद-बूंद का हुआ मोहताज किसलिए
क्या शहंशाही हुक्म से वाकिफ़ नहीं है तू
पत्थर तराशने की सनक आज किसिलए
 
प्रधानमन्त्री जी के लिए दो पंक्तियाँ:-



"बड़े अफ़सोस हाकिम थे समझदारी नहीं आई,
क्यों अपने कौम के जज्बे की खुद्दारी नहीं आई!"


"अभी तक नाचते आये हो मैडम के इशारों पर,
आप सरदार हो कर के भी सरदारी नहीं आई!"
 
माना की हम छप ना पाए पुस्तक या अखबारों में,
लेकिन यह क्या कम है, अपनी गिनती है खुद्दारों में
 
मैं तोड़ लेता यदि तू गुलाब होती,
मैं उत्तर बनता यदि तू प्रश्न होती,
सब जानते हैं मैं नशा नही करता,
पर मैं भी पी लेता यदि तू शराब होती!
 
दर्द-ए-दिल के मारे 'टुंडा जी' का साथ देने के लिए राजमाता भी अस्पताल में भर्ती।
अब तो 'सीप', 'रमी' और 'दहला पकड़' के दौर चलेंगे ए ग़ालिब ।
 
मैंने रुपये से कहा कि तुम केवल एक कागज के टुकडे हो,
रूपया मुस्कुराया और बोला बिल्कुल मैं एक कागज का टुकडा हूँ,
परन्तु मैने आज तक जीवन में कूड़ेदान का मुँह नही देखा।
 
": हर रोज हम नशे में होते हैं और रात गुज़र जाती है, एक रोज़ रात नशे में होगी और हम गुज़र जायेंगे .....???"
 
मयखाने में जाम टूट जाता है,

इश्क में दिल टूट जाता है,

ना जाने क्या रिश्ता है इन दोनों में

जाम टूटे तो इश्क याद आता है

और दिल टूटे तो जाम याद आता है।
 
ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता
अगर और जीते रहते यही इंतज़ार होता।

तेरे वादे पर जिए हम तो ये जान झूठ जाना
कि खुशी से मर न जाते ग़र ऐतबार होता।

ये कहाँ की दोस्ती है कि बने हैं दोस्त नासेह
कोई चारासाज होता कोई ग़म-गुसार होता

कहूँ किससे मैं कि क्या है शब-ए-ग़म बुरी बला है
मुझे क्या बुरा था मरना अगर एक बार होता।

कोई मेरे दिल से पूछे तेरे तीर-ए-नीमकश को
ये ख़लिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता।
 
चूम कर जिन्हें सदा क्राँतियाँ गुज़र गईं गोद में लिये जिन्हें आँधियाँ बिखर गईं पूछता ग़रीब वह रोटियाँ किधर गई ।
 
हर बार मुझे जमाने कि जुदाई ना दिया कर |
तु मेरा नही तो मुझको दिखाई ना दिया कर ||

सच झूठ हौ जाता हे आँखो से जाहिर |
मुझको तु इतनी सफाई ना दिया कर ||
 
उसके कत्ल पर मै चुप था,
अगला नम्बर मेरा आया
मेरे क़त्ल पर आप चुप हों,
अगला नम्बर आपका है.
 
कल किसी और ने खरीद लिया तो शिकवा मत करना
इसलिए हम पहले तेरे शहर में बिकने आये है...
 
अर्ज किया है -:मेरी किस्मत
मेरी तकदीर
हो गयी,..मेरी किस्मत मेरी तकदीर
हो गयी,...हमने
उनकी याद में इतने ख़त लिखे किवह
‘रद्दी’ बेचकर ही अमीर
हो गयी.
 
बाँध कर सर पर कफ़न, सरहद पर खड़े होते है,
जब याद आती है घर की, चुपकेचुपके रोते है,
और वो क्या समझेंगे, मेरे दिल की तड़प , मेरे दिल की आह,
जो नेता सरे आम संसद मे सोते है..|||
 
तेरी जानिब उठी जो कहर की नज़र,
उस नज़र को झुका के ही दम लेंगे हम...

तेरी धरती पे है जो कदम ग़ैर का
उस कदम का निशाँ तक मिटा देंगे हम...

जो भी दीवार आयेगी अब सामने
ठोकरों से उसे हम गिरा जायेंगें...

ऐ वतन ऐ वतन हमको तेरी कसम तेरी राहों में जा तक लुटा जायेंगे l
 
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