Shayri (Part 1)

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गुजरती शाम तुमसे कह रही है,
घनेरी रात आ जाने से पहले |
जहाँ भी हो चले आना प्रिये तुम,
हमारा दम निकल जाने से पहले ||
 
तू मेरी चाहत पर एक एहसान कर
अपने सारे गम तू मेरे नाम कर
जो लम्हे रुलाते हैं तुझे याद बनकर
वो आंसू मेरी नजरो के नाम कर
 
बेहद शरीफ लोगो से कुछ फासला रखो
पी लो पर कभी न कहो तुम नशे में हो

कागज का लिबास चरागों के शहर में
जाना संभल संभल के चलो तुम नशे में हो
 
Tuje Duniya Se Furst Mile To Tujse Pochon,
Yaad B Aate Hain Tujhe Sath Bitaye Hue Wo Pal?
Ek Tu Hai K Tuje Bholna Nahi Chahte Hum,
Warna Andaz To Hume B Aate Hain Zamane Wale.
 
Laut Jati Hai Duniya Gum Hamara Dekh Kar
Jaise Laut Jati Hai Lehrein Kinara Dekh Kar
To Kandha Na Dena Mere Janaze Ko Kahi
Phir Zinda Na Ho Jaoo Tera Sahara Dekh Kar.
 
Mat Bana Rista Is Jaha Me,
Bahut Muskil Unhe Nibhana Hoga,
Har Ek Rista Ek Naya Gam Dega,
Ek Taraf Bebas Tum, Aur Ek Taraf-
Hasata Jamana Hoga !!
 
Ye Arzu Thi K Aisa B Kuch Hua Hota
Meri Kami Ne Tujhe Bhi Rula Diya Hota
Mai Loat Ata Tere Pass Ek Lamhe Main
Tere Labon Ne Mera Nam To Liya Hota.
 
Tum Kisi Ki Khatir
Mujhe Bhool Bhi Gaye To Koi Bat Nahi........
Main Bhi To Bhool Gaya Tha Sara Zamana
Tumhari Khatir........
 
बेखयाली, बेखुदी, बेबसी दे गया
कुछ नए तजुर्बे अजनबी दे गया।।

उसके आ जाने से हर कमी मिट गयी
जाते -जाते वो अपनी कमी दे गया।।

सोचने के लिए पल की भी मोहलत ना दी
जागने के लिए एक सदी दे गया।।

ले गया जान-ओ-दिल जिस्म से खींच कर
रूह को एक मगर ताजगी दे गया।।

उस की सौदागरी में भी इन्साफ था
ज़िन्दगी दे गया, ज़िन्दगी ले गया।।
 
मौत है एक लफ्ज़ बेमानी
जिसको मारा हयात ने मारा
 
हर खुशी आएगी पहले, ग़म उठाना सीख लो |
रौशनी पानी है तो फिर, घर जलाना सीख लो ||


 
हादसे इंसान के संग, मसखरी करने लगे |
लफ़्ज़ क़ागज़ पर उतर, जादूगरी करने लगे||
 
टुकड़े-टुकड़े दिन बीता धज्जी धज्जी रात मिली
जिसका जितना आँचल था उतनी ही सौगात मिली
 
देखिए गौर से रुक कर किसी चौराहे पर |
जिंदगी लोग लिए फिरते हैं लाशों के तरह ||
 
फूलों से जग आसान नहीं होता है..
रुकने से पग गतिवान नहीं होता है..
अवरोध नहीं तो संभव नहीं प्रगति भी..
है नाश जहां पर निर्मम वहीं होता है..
मैं बसा सुकून नव-स्वर्ग “धरा” पर जिससे..
तुम मेरी हर बस्ती वीरान करो..

मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं..
तुम मत मेरी मंजिल आसान करो..
 
आंसू पौछकर हंसाया है मुझे
मेरी गलती पर भी सीने से लगाया है मुझे
कैसे प्*यार न हो ऐसे दोस्*त से
जिसकी दोस्*ती ने जीना सिखाया है मुझै ...
 
ओस की बूंदे है, आंख में नमी है,
ना उपर आसमां है ना नीचे जमीन है
ये कैसा मोड है जिन्*दगी का
जो लोग खास है उन्*की की कमी हैं ||
 
गुलसन में भी बहार आते हैं !
हर किसी पे हम कहाँ यकीन कर पाते हैं !!
दिल का जिसपे होता हैं ज्यादा भरोसा !
कसम से उसी से हम धोखा खाते हैं !
 
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