Shayri (Part 1)

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"चाप सुनकर जो हटा दी थी, उठा ला साकी
शेख साहब हैं, मैं समझा था मुसलमान है कोई"
 
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[h=6]गुनाहगारों पर देख कर तेरी रहमत का सिला,
बेगुनाह भी चिल्ला उठे हम भी गुनाहगार है ......[/h]
 
[h=6]सारी रात इसी कसम -कश में गुजर गयी जालिम ..

गौर फरमाइयेगा .....

सारी रात इसी कसम -कश में गुजर गयी जालिम ..

की रजाई की लम्बाई किधर है और चौड़ाई किधर ........[/h]
 
एक ही गलती हम सारी उम्र करते रहे;

धूल चेहरे पे थी; और हम आइना साफ़ करते रहे!
 
क्या बात है विजय भाई सारे के सारे शेर ज़बरदस्त है. . ..लगता है कतल कर के ही मानोगे!!


सुभान अल्लाह .. अल्हम दुलिल्लाह, बोहोत उम्दा !
 
बचपन की वो अमिरी ना जाने कहाँ खो गई
जब बारिश के पानी में हमारे भी जहाज तैरा करते थे
 
"मुफ्त की पीते थे मय, और सोचते थे
रंग लाएगी हमारी ये फाकामस्ती, एक दिन"
 
अगर होता है इत्तेफाक तो यूं क्यों नही होता
वो चले उस राह पर जो मुझ पर खत्म हो
 
कैसे भूला दूं उसको मैं कि
मौत इंसानो को आती है, यादों को नही
 
डूबी है मेरी उंगलियां खुद अपने ही लहू में
ये टूटे हुए काँच पे भरोसे की सजा है
 
मुझे आज भी उसके प्यार की सिद्दत रोने नहीं देती |
वो कहती थी ,मर जायेंगे तेरे आंसुओं के गिरने से पहले |
 
बिखर रही हे मेरी ज़ात ,उसे कहना
.कभी मिले तो ये बात उसे कहना

.वोह साथ थी तो ज़माना था हमसफ़र मेरा
.मगर अब कोई नहीं मेरे साथ उसे कहना .​
 
तरस गयी हैं आँखें दीदार ऐ यार को,,
और वो हैं के हमें भूले बैठे हैं....!!!
 
हर चीज़ का खोना भी बड़ी दौलत है
बेफ़िकरी से सोना भी बड़ी दौलत है
इफ़लास ने सख़्त-मौत आसाँ कर दी
दौलत का न होना भी बड़ी दौलत है
 
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