Shayri (Part 1)

Status
Not open for further replies.
कभी लगा वो हमें सता रहे हैं
कभी लगा के वो करीब आ रहे हैं ,
कुछ लोग होते हे आंसुओं की तरह ,
पता नहीं लगता साथ
दे रहे हैं या छोड़ के जा रहे हैं
|​
 
मिटा भी दूँ नाम तक तेरा किताब -ए -ज़िन्दगी से ,

मगर पल पल रुलाएगी सताएगी कमी तेरी ......​
 
साडे जेहे बरबाद दिलां दा जीना की ते मरना की ,

अज्ज तेरे दिल चो निक्क्ले आ कल दुनिया तो निक्कल जावांगे !
 
हमारा जीने का होंसला तो देखो ,
दिल के टुकड़े होते हैं हजार ,
फीर भी तुम्हारे लिए जी लेते हें देखो ,
दामन फट जाते हैं जार-जार
फीर भी तुम्हें ओढाने के लिए सी लेते हें देखो |
 
कभी कभी जख्म भरते हैं वक्त से,
हर बार असर दवा का नही होता
कई बार दीए बुझ जाते हैं अपनी ही गलती से
हर बार कसूर हवा का नही होता
 
ना जाने किस गम को छुपाने की तमन्ना थी उनकी
कि आज हर बात पर उनको हँसते देखा
 
एक नफरत ही नही है दुनिया मै "दर्द का सबाब"
"मोहोब्बत" भी सकून वालों को तकलीफ दिया करती है
 
जिन्दगी किसी के लिए नहीं रूकती .....
बस जीने की वजह बदल जाती हे |
ठोकर भी बेकार नहीं लगती ........
बस जिन्दगी लडखडा कर संभल जाती हे |
 
तुम्हारे स्वप्न क्या टूटे सरे बाज़ार हंगामा
मैंने जब भी कुछ चाह हुआ हर बार हंगामा
मेरे मौला ये कैसी कशमकश तूने अता कर दी
गिरें आंसू तो हंगामा जो मुस्कुराये तो हंगामा !!​
 
कोई किसी का नहीं इस दुनिया में ,सब रस्ते के राहीं हैं ......
कोई मिल गया कोई बिछड़ गया ,
किसी की पहले किसी की बाद में धाईं हे |
 
नए गमो से तारूफ कराने आया था। अभी-अभी ये मेरे गिर्द किसका साया था।
हवा हो, गम हो, खुशी हो या तुम हो, किसी ने रात में दरवाजा खटखटाया था।​
 
मिल जाये उलझनों से फुर्सत तो ज़रा सोचना की
क्या सिर्फ फुर्सतों में याद करने तक का रिश्ता है हमसे
 
उमर-ए-दराज़ मांग कर लाये थे चार दिन ,
दो आरज़ू में कट गए दो इन्तेज़ार में !!
 
खुली छतों के दिए कब के बुझ गए होते ....
कोई तो है जो हवाओं के पर कतरता है |​
 
तेरी दोस्ती ने दिया “सकून” इतना ,
के तेरे बाद कोई “अछा ” न लगे ,
तुझे करनी है “बेवफाई ” तो इस अदा से कर ,
के तेरे बाद कोई “बेवफा ” न लगे .​
 
कुछ इस कदर निकला उसकी चिता से धुंआँ ,
की वो घूम कर मेरे पास आ रहा था ,
पता नहीं आसुओं को वो और बढ़ा रहा था ,
या आसुओं को सुखा रहा था |​
 
सब कुछ मिला ,बस खुदाई के सिवा ,
जिंदगी बहुत पसंद आई ,तन्हाई के सिवा
उसकी हर अदा पसंद आई ,
सिर्फ ,बेवक्त जुदाई के सिवा |​
 
मुझे समझाया ना करो कि, अब तो हो चुकी मुझको
मोहब्बत मशवरा होती तो, तुम से पूछ कर करते
 
सौ कशतिया जलाकर चले साहिलों से हम
अब क्या बताएं की उस पार कौन था
ये फैसला तो शायद वक़्त भी ना कर सके
सच कौन बोलता था, अदाकार कौन था
 
Status
Not open for further replies.
Back
Top