Shayri (Part 1)

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किसे खबर थी ,किसे यकीं था,ऐसे भी दिन आयेंगे |
जीना भी मुश्किल होगा और मरने भी ना पायेंगे ||
हम जेसे बर्बाद दिलों का जीना क्या और मरना क्या |
आज तेरी महफ़िल से उठे ,कल दुनिया से उठ जायेंगे ||
 
Hazaar gam the meri zindgi akeli thi,,,हज़ार गम थे मेरी जिंदगी अकेली थी,,,
Khushi jahan ki mere vaaste ek paheli thi,,,खुशी जहान की मेरे वास्ते एक पहेली थी,,,
Wo aaj bhaag ke nikalte hain mere saaye se,,,वो आज भाग के निकलते हैं मेरे साये से,,,
Maine jinke liye gam ki dhoop jheli thi,,,मैंने जिनके लिए गम की धुप झेली थी,,,
 
हमें इज़हार करना न आया ,
उन्हें प्यार करना न आया .
हम बस देखते ही रह गए ,
और वक़्त को थामना न आया .
वोह चलते चलते इतने दूर चले गए ,
हमें रोकना भी न आया |​
 
हर रोज़ मुझ पर एक तीर छोड़ा जाता है,
हर रोज़ मुझे तोडा मरोड़ा जाता है !
मगर वो नादान दुश्मन ये जानता नहीं कि -
बुलंद होसलों का महल हर वार पे और मजबूत हो जाता है !!
 
पतझड़ के पत्तों को यों ना रौंदो अपने पाँव में,

कभी बैठे थे तुम इनके छावं में.
 
अब देखते हैं जान किसकी जाती है
मैने उसकी ओर उसने मेरी कसम खाई है
 
कसम किसी ने, किसी की भी हो खाई ,
शायद दोनों की जान पे बन आई ,
पर दोनों की इसी कसमकश में ,
नकली मोहब्बत आम हो गई |
"सुलील "तेरी मोहबत बदनाम हो गई ||
 
कौन जाने कब हमारे हाथ पहुंचें जाम तक
जिंदगी सुबहो से अपनी आ गयी है शाम तक
और सारी मंजिलों के क़र्ज़ मैंने भर दिए
इक सफ़र बाकी बचा है बस तुम्हारे नाम तक​
 
आज कम्बखत्त ज़िन्दगी ने पूछ ही लिया हमसे .....
कहाँ है वोह जो तुम्हें मुझ से भी ज्यादा अज़ीज़ था |​
 
कुछ ये सोच कर उस ने अलविदा कहा होगा मुझको ,
बड़ा गरीब है .. मोहब्बत के सिवा क्या देगा ..!​
 
मुझे इंकार ही केर दे मगर कुछ गुफ्तगू तो कर ...!!
तेरा खामोश सा रहना मुझे तकलीफ देता है ..!!​
 
एक बार क्या बना दिया..खुदा ने इंसा को,
बार-बार बनाया करता हे..इंसा अब खुदा को.​
 
अजीब लुत्फ़ उठा रहा है कोई , दीदार ऐ वफ़ा का

के नज़रें भी मुझ पे हैं और पर्दा भी मुझ से है ...​
 
"खुद को मैं ग़ालिब समझता आया तेरे मिलने तक,
अब बहुत मजबूर से दिखते मेरे अल्फाज़ हैं"...!!!​
 
खाली हाथों को मेने उठाया ,उस की जिन्दगी के लिए ,
और वो उन् की लकीरों में से निकल गई ......​
 
मेने तड़प कर कहा की तुम बहुत याद आती हो ...
उसने कहा ,"तुम्हे इस के सिवाय आता ही क्या हे .....​
 
चलो ...... ना इश्क ही जीता ना अक्ल हार सकी
तमाम वक्त मजे का मुकाबला तो रहा !!!
 
हरे भरे कई शहरों का तजुर्बा है मुझे

कहीं भी जाईये.... जंगल जरूर निकलेगा
 
Apni shakhshiyat hi kuch aisi hai,,,अपनी शख्शियत ही कुछ ऐसी है ,,,
Ki aksar zamaane ko berukhi ka sa gumaan hota hai,,,कि अक्सर ज़माने को बेरुखी का सा गुमा होता है,,,
shikayat ye ki main milta julta nahin logon se,,,शिकायत ये कि में मिलता जुलता नहीं लोगों से,,,
Kyonki main nikalta hi tab hoon jab ye jahan sota hai,,,क्योंकि में निकलता ही तब हूँ,जब ये जहाँ सोता है...




 
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