Shayri (Part 1)

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कुछ दूर तक रोज़ साथ दौड़ती थी ...पलट कर देखा तो...सिर्फ धूल थी...
मेरे क़दमों की भूल थी.​
 
मैं पानी ...तेरी प्यास ही सही...
यूँ घूँट घूँट मुझको तबाह ना कर.​
 
साँसों में अमृत घुलने दो,मन को मंदिर हो जाने दो,
वो सपने में आएगी मुझको सदियों तक सो जाने दो,
इश्क आग का दरिया है तो बहने दो इस धारा को,
इस दरिया का बस इक हिस्सा मुझको भी हो जाने दो
(सुरेश अलबेला)
 
वो शामें अब नहीं आतीं, के जिनके इंतज़ार में

दोपहरें उड़ती फिरतीं थीं, लम्हें पलकें बिछाते थे !!
 
क्यूं कहते हो मेरे साथ कुछ भी बेहतर नही होता
सच ये है के जैसा चाहो वैसा नही होता
कोई सह लेता है कोई कह लेता है
क्यूँकी ग़म कभी ज़िंदगी से बढ़ कर नही होता

आज अपनो ने ही सीखा दिया हमे
यहाँ ठोकर देने वाला हर पत्थर नही होता
क्यूं ज़िंदगी की मुश्क़िलो से हारे बैठे हो

इसके बिना कोई मंज़िल, कोई सफ़र नही होता
कोई तेरे साथ नही है तो भी ग़म ना कर
ख़ुद से बढ़ कर कोई दुनिया में हमसफ़र नही होता !!
​
 
अब बस भी कर लोगों को टूटकर चाहना "दिल-ऐ-नादाँ" .

वो देख एक और शख्स तुझे छोड़ कर जा रहा है​
 
काश खुदा ने मुझे किताब बनाया होता ....!

वो पढ़ते-पढ़ते सो जाती मुझे सीने से लगाकर ...​
 
बहुत दिल से वोह सुनते हैं हमारी सारी बातों को ...
जो दिल की बात कीजे , बातों का रुख मोड़ देते हैं ...!!!​
 
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शिकायतें भी थी उसे तो सिर्फ मेरे ख़ुलूस से ...
अजब था वोह शख्स मेरी आदतें न समझ सका ...!!!​
 
"यह लफ़्ज़ों की शरारत है ,
संभल कर कुछ भी लिखना तुम ,
मोहब्बत लफ्ज़ है
लकिन यह अक्सर हो भी जाती हे …!."​
 
आईने
में अपनी सूरत भी न पहचानी गयी

आंसुओं
ने आँख का हर अक्स धुंधला कर दिया



उसके वादे के इवज़* दे डाली अपनी
ज़िन्दगी

एक सस्ती शय का ऊंचे भाव सौदा कर
दिया





था
तो नामुमकिन तेरे बिन मेरी साँसों का सफर

फ़िर
भी जिंदा हूँ मैंने तेरा कहना कर दिया
​
 
तेरा चले जाना मेरा नसीब ही सही लेकिन ....

मेरी किस्मत में लिखा है तुझे टूट के चाहना ...​
 
यही ख्वाहिश थी की कुछ गुनगुनायें ज़माने से अलग
खामोश रहते हैं की हर लफ्ज़ सुना सुना सा लगता है..​
 
मेरे जैसी ही कुछ संजीदगी उस चाँद में भी हैं
बिछड़ता रात से हर दिन मगर.....खामोश रहता हैं..​
 
काश खुदा ने मुझे किताब बनाया होता ....!

वो पढ़ते-पढ़ते सो जाती मुझे सीने से लगाकर ...​

मुखातिब हू अपनी बिलखती सांसो की पहचान से,
किताब हू जो बेजुबान है अक्षरों की लिखावट से,
दरखत हुई जो अपनी लिखावट को पहचान दी,
पर लिखावट अभी भी बेजुबान है जो लेखनी की पहचान थी
 
"क्यूं रोते हो इस बेवफा दुनिया में

"आंसुओं से तकदीर बदलती तो आज मेरा भी कोई अपना होता .​
 
“बिकता अगर प्यार जो कौन नहीं खरीदता

बिकती अगर खुशियां तो कौन उसे बेचता

दर्द अगर बिकता तो हम आपसे खरीद लेते

और आपकी खुशियों के लिए हम खुद को बेच देते”
 
ख्वाहिशों का काफिला भी अजीब है ग़ालिब ...!!

अक्सर वहीं से गुज़रता है जहां रास्ता नहीं होता ..!!​

​
 
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