Shayri (Part 1)

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हमसफ़र सो रहा है सन्नाटा
दास्ताँ हो रहा है सन्नाटा

कोई दस्तक न कोई आहट है
चैन से सो रहा है सन्नाटा

कैसे रंगीनियों में डूबीं रात
खुसबुए बो रहा है सन्नाटा

दूधिया चांदनी को ओढ़े हुए
बेखबर सो रहा है सन्नाटा

क़त्ल करके तमाम आवाज़ें
आस्तीं धो रहा है सन्नाटा
('रिन्द' सागरी)
 
शाखों से टूट जायें वह पत्ते नहीं हैं हम,
आंधी से कोई कह दे औकात में रहे।
 
खुदा तो इक तरफ, खुद से भी कोसों दूर होता है,
बशर जिस वक्त ताकत के नशे में चूर होता है।

बशर --- मानव, आदमी, मनुष्य
 
छोड़ा नहीं खुदी को, दौड़े खुदा के पीछे,
आसां को छोड़ बंदे, मुश्किल को ढूंढ़ते हैं।
खुदी --- अहंकार, अभिमान, यह भाव कि हमीं हम हैं
 
जिन्हें जमीं पै भी चलने का शऊर नहीं,
उन्हीं का है यह तकाजा कि आसमाँ लेलो।
 
दरिये ने भी क्या ख्वाइश की है,
आँखों को शर्म आये कुछ ऐसी बात की है |
होठों पर मुस्कान दिल बहला देती लेकिन,
कातिल है ‘मसरूर’ उसकी नज़र ने मोहब्बत की बात की है |
सच तो कह ज़रा आइना रोज़ बदलता है,
टूटे हुए शीशे ने आज ज़िन्दगी की बात की है |
बेवफाई का ज़माना किसे अपना ना समज,
मस्जिद में आज खुदा ने फरेबी की बात की है |
 
सबब रोने का वो पूछे तो बस इतना कहना,
मुझे हसना नही आता जहाँ पर तुम नही होते.......!!



 
मशगुल हैं सब यहाँ ,
कोई हंसने में ,
कोई रोने में ,
कोई इस कोने में ,
कोई उस कोने में ||---रवि "अतृप्त"
 
ये मरना ये कफन ये कब्र तो रस्म-ए-शरीयत है ग़ालिब,
मर तो हम तब गए थे, जब हसरत-ए-इश्क दिल में जगी थी
 
kya banne aaye thy kya ban baithe
kabhi mandir bana baithe kabhi masjid bana baithe
humse to achi jaat parindo ki hai
jo kabhi masjid pe jaa baithe kabhi mandir jaa baith te hain.
 
तिजोरिया भरते है लोग उम्र भर के लिए ..
मगर अफ़सोस मौत का फरिस्ता कभी रिश्वत नही लेता |
 
Aaj Dard ko lafzon mein Bayan karne wale,
Is Duniya me Mahaan ban Gaye,
Jara Unhe jakar Dekho,
Jo Apne Dard Ko Bhulakar,
Dusro ke liye Muskaan ban gaye.
 
Zindagi bhi badi ajeeb hoti hai,
Ek pal. kaise, Aur doosra he pal phir waise he hoti hai,
Ab tak koi samaj nahi paya iska har rang ko,
Kyo ki Zindagi ke har pal mein chupi ek nayi umang hoti hai.
 
Jindagi ki Rah mai Bahut se Dost Milenge,
Ham Kya Hamse Bhi Acchhe Hajar Milenge,
Lekin In Acchhon Ke Bhid Mai Bhula Na Dena Hame,
Kyu Ki Ham Tumhe Dubara Kaha Milenge.
 
जिस रोज उतरूंगा मैं बेवफाई पर
सौ गुना भारी पडूंगा उस हरजाई पर

वही शख्स मेरी मुखबरी कर रहा है
दिन रात लिखता हूँ जिसकी अंगडाई पर


जिस रोज उतरूंगा मैं बेवफाई पर
सौ गुना भारी पडूंगा उस हरजाई पर

वही शख्स मेरी मुखबरी कर रहा है
दिन रात लिखता हूँ जिसकी अंगडाई पर

किसके दम पर महफ़िल सजाने चला था ?
बैठा हंस रहा हूँ अपनी तन्हाई पर

दौरे-अलम में जो तमाशाबीन बने
किसलिए फक्र करूं ऐसी असनाई पर

महोब्बत का उसे देवता क्या माना ?
खूब सितम ढाता है अपनी खुदाई पर

वो ओरों पर क्या यकीं करेगा बेचैन
शक रहता है जिसे अपनी परछाई पर


 
रोज़ तारों को नुमाइश में खलल पड़ता है
चाँद पागल है अंधेरे में निकल पड़ता है
मैं समंदर हूँ कुल्हाड़ी से नही काट सकता
कोई फव्वारा नही हूँ जो उबल पड़ता है
कल वहाँ चाँद उगा करते थे हर आहट पर
अपने रास्ते में जो वीरान महल पड़ता है
ना त-आरूफ़ ना त-अल्लुक है मगर दिल अक्सर
नाम सुनता है तुम्हारा तो उछल पड़ता है
उसकी याद आई है साँसों ज़रा धीरे चलो
धड़कनो से भी इबादत में खलल पड़ता है!
Rahat Indori
 
ज़ुल्फ़ कन्धे से जो सरकी तो कमर तक पहुँची
मैंने पूछा था कि ये हाथ में पत्थर क्यों है
बात जब आगे बढी़ तो मेरे सर तक पहुँची
मैं तो सोया था मगर बारहा तुझ से मिलने
जिस्म से आँख निकल कर तेरे घर तक पहुँची
तुम तो सूरज के पुजारी हो तुम्हे क्या मालुम
रात किस हाल में कट-कट के सहर तक पहुँची
एक शब ऐसी भी गुजरी है खयालों में तेरे
आहटें जज़्ब किये रात सहर तक पहुँची
 
अगर ऐ नाखुदा तूफान से लड़ने का दमखम है,
इधर कश्ती को मत लाना, इधर पानी बहुत कम है।


नाखुदा - मल्लाह, केवट, नाविक, कर्णधार
दमखम - शक्ति, हिम्मत, उत्साह, उमंग, हौसला
 
अभी तो बहुत दूर है तुमको जाना,
है पुरपेच राहों से होकर गुजरना।
संभलकर है गिरना, है गिरकर संभलना,
कहाँ तक चलोगे किसी के सहारे।

-अफसर मेरठी
 
आहन नहीं कि चाहे जिधर मोड़ दीजिए,
शीशा हूँ मुड़ तो सकता नही, तोड़ दीजिए।
पत्थर तो रोज आते ही रहते हैं सहन में
हल इसका यह नहीं है कि घर छोड़ दीजिए।

आहन --- लोहा, लौह
सहन --- आंगन, अँगनाई
 
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