Shayri (Part 1)

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सुना था दिल समन्दर से भी गहरा होता है ।
हैरान हूँ इस में समाया नहीं कोई तेरे सिवा ।।
 
बलात्कारीयो के लिए एक शेर अर्ज है-
औरत है वो कोई गोश्त नहीं जो तू उसे नोच ले,
हबस की आग में जलने बाले भेड़िये...
एक बार अपनी माँ बहन की भी सोच ले..!!
 
आज हिचकियों ने कमाल कर दिया
जवाब को ही मेरा सवाल कर दिया

वो यूँ आ के गुज़र गये करीब से
कि धडकनों ने दिल में बवाल कर दिया.......
 
ना मालूम कब से हे ताल्लुक तुमसे ये अपना |
तुम्हारा अक्स था दिल में तुम्हारे नाम से पहले ||
 
इस दौर के लोगों में.............वफ़ा ढूंढ रहे हो
तुम ज़हर की शीशी में..........दवा ढूंढ रहे हो
 
जिस नगर भी जाएँ किस्से हैं कमबख्त दिल के |
कोई ले के रो रहा है, कोई दे के रो रहा है ||
 
सारी उम्र पूजते रहे लोग अपने हाथों से बनाये पत्थर के खुदा को
हमने खुदा के हाथों के बनाये हुए को चाहा तो गुनहेगार हो गए

 
[h=5]वेदना के व्यक्त जल को कौन समझेगा
मेरे आँसू के महल को कौन समझेगा

इस शहर में झूठ ही मशहूर होता है
सत्य पर मेरी पहल को कौन समझेगा[/h]
 
मर्दानगी को तुमने तो मजमा बना दिया।
अब दोज़ख में भी दो गज़ ज़मीन न मिलेगी।।
 
मैं उम्र भर न कोई दे सका जवाब,
वह इक नजर में, इतने सवालात कर गये।
 
आँसुओ मे रची खुशी की तरह
रिश्ते होते हैं शायरी की तरह

जब कभी बादलों से घिरता है
चाँद लगता है आदमी की तरह
 
Last edited:
तितलियों का मुझे टूटा हुआ पर लगता है
दिल पे वो नाम भी लिखते हुये दर लगता है

जिंदगी तूने मुझे कब्र से कम दी है जमीं
पाँव फैलाऊँ तो दीवार मे सर लगता है...
 
परखना मत, परखने मे कोई अपना नही रहता
किसी भी आ-ई-ने- मे देर तक चेहरा नही रहता

बड़े लोगों से मिलने मे हमेशा फासिला रखना
जहां दरिया समंदर मे मिला, दरिया नही रहता ।
 
ख़ुशामद का मेरे होठों पे, अफ़साना नहीं आया।
मुझे सच को कभी भी झूठ बतलाना नहीं आया।

कहीं गिरवी नहीं रक्खा, हुनर अपना कभी मैंने,
इसी कारण मेरी झोली में नज़राना नहीं आया।

भले ही मुफ़लिसी के दौर में फ़ाक़े किये मैंने,
मगर मुझको कभी भी हाथ फैलाना नहीं आया।

किसी अवरोध के आगे, कभी घुटने नहीं टेके,
मैं दरिया हूँ मुझे राहों में रुक जाना नहीं आया।

सियासत की घटाएँ तो बरसती हैं समुन्दर में,
उन्हें प्यासी ज़मीं पे प्यार बरसाना नहीं आया।

परिन्दे चार दाने भी, ख़ुशी से बाँट लेते हैं,
मगर इंसान को मिल-बाँट के खाना नहीं आया।

अनेकों राहतें बरसीं, हज़ारों बार धरती पर,
ग़रीबी की हथेली पर कोई दाना नहीं आया।

सरे-बाज़ार उसकी आबरू लु्टती रही ‘जौहर’
मदद के वास्ते लेकिन कभी थाना नहीं आया।
 
मुहब्बत एक खुशबू है, हमेशा साथ चलती है
कोई इंसान तनहाई मे भी तन्हा नही रहता

तुम्हारा शहर तो बिलकुल नए अंदाज वाला है
हमारे शहर मे भी अब कोई हम सा नही रहता
 
आईना धूप का दरिया मे दिखाता है मुझे
मेरा दुश्मन मेरे लहजे मे बुलाता है मुझे

खूबसूरत है बहुत रात की तनहाई भी
सात रंगों मे तेरा दर्द सजाता है मुझे
 
ये कसक दिल की दिल मे रह गई
जिंदगी मे तुम्हारी कमी रह गई

एक मैं, एक तुम, एक दीवार थी
जिंदगी आधी आधी बनती सी रह गई

रात को भीगी भीगी छतों की तरह
मेरी पलकों पे थोड़ी नमी रह गई

मैंने रोका भी नही, वो चला भी गया
बेबसी दूर तक देखती रह गई

मेरे घर की तरफ धूप की पीठ थी
आते आते इधर चाँदनी रह गई (बशीर बद्र )
 
जिंदगी भी अजीब दरिया है
जिंदगी भर उसी की प्यास रहे

खुश रहे या बहुत उदास रहे
जिंदगी तेरे आसपास रहे

आज हम सबके साथ खूब हँसे
और फिर देर तक उदास रहे

इक सितारे के इंतजार मे गुम
शाख पर फूल बाद हवास रहे
गुज़र गया वो वक़्त जब तेरी हसरत थी मुझे,

अब तू खुदा भी बन जाये तो भी तेरा सजदा ना करूँ !!
 
हंसकर जियो जिंदगी दिल उदास क्यों करते हो.
कल की छोडो कल पर आज एहसास क्यों करते हो.

गुजरे हुए कल को भूल जाना है बेहतर.
गम में अश्क बहाने से मुश्काना है बेहतर.

जब होनी को अनहोनी में हम ढाल नहीं सकते.
जब किस्मत में लिखी बात को टाल नहीं सकते.

फिर लुत्फ़ की लज़ीज़ स्वाद का सत्यानाश क्यों करते हो.
कल की छोडो कल पर आज एहसास क्यों करते हो.

गम ख़ुशी के मौसम तो, आते-जाते रहते है.
कभी हंसाते है तो, कभी रुलाते रहते है.

चिंता है चिता करोगे तो जल जावोगे.
बेसब्री से दुनिया में कुछ नहीं तुम पाओगे.

सब है मतलब के मारे, किसी से आस क्यों करते हो.
कल की छोडो कल पर आज एहसास क्यों करते हो.
 
ये दिल तो तेरे नाम पे कुर्बान कर दिया
हमने तो अपनी जान को भी बेजान कर दिया

रखते नहीं हो शौक़ तुम दीदार का मेरे
आँखों को अपनी मुझसे ही अनजान कर दिया

हम तो समझे थे कि निभाओगे साथ तुम
तन्हा मुझे छोड़ के परेशान कर दिया

कुछ पल सही तुम मेरे दिल मैं तो रहते
नीलाम करके मुझको बेमकान कर दिया

होना था किसी और का चुपके से हो जाते
तुम ने तो सरेआम ऐलान कर दिया
 
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