1.क्या भारत में यह जन आक्रोश एक सामाजिक एवं राजनितिक क्रांति में बदलेगा?
नहीं.
1.1 यदि हाँ तो क्यों ?
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1.2 यदि नहीं तो क्यों ?
क्यूंकि पिछले तीन चार महीने घटनापूर्ण बेशक रहे हों, पर अभूतपूर्व कहीं से नहीं थे. आज के समय में, मीडिया के चलते, हर घटना का विवरण दस गुणा करके होता है. अन्ना का आन्दोलन इन्टरनेट और टीवी पे अधिक और सड़कों पे कम था. बाबा के आन्दोलन में जनता थोड़ी और थी, पर अधिकतर लोग बाबा के अनुयायी हैं न की आन्दोलनकारी. इससे कहीं अधिक बवाल किसी भी जाति के आरक्षण के आन्दोलन में होता है, पर वोह दिल्ली के जंतर मंतर पे नहीं होता और मीडिया को उसमें ख़ास दिलचस्पी नहीं होती.
2. क्या वर्तमान जन आक्रोश में क्रांति के सभी घटक मौजूद हैं?
मुझे नहीं लगता. लोग क्रांति पे तब उतरते हैं जब वोह परिस्तिथियों से एक लाचारी महसूस करते हैं. और उनके पास खोने को कुछ ज्यादा नहीं होता. आज का मध्य वर्ग अपनी ज़िन्दगी की दौड़ में व्यस्त है. दूसरा, आक्रोष अपनी चरम सीमा पे तब पहुचता है, जब उसे कोई निकास नहीं मिलता. प्रजातंत्र को चाहे जितनी भी गाली दे दो, पर लोग सरकार के खिलाफ जम के बोल सकते है. जिससे आक्रोष अपने आप कम हो जाता है.
2.1 क्या भारत में कभी क्रांति हो भी सकती है ?
पता नहीं. क्रांति वैसे ही बहुत कठिन होती है. भारत जैसे देश में जहां इतनी विविधताएं हैं, वहाँ लोगों को क्रांति के लिए जोड़ना और भी कठिन है. प्रजातंत्र के चलते यह और भी कठिन हो जाता है, चूँकि लोग अपनी भड़ास निकाल सकते हैं. दिल्ली में जहां क्रांति को लेके सबसे ज्यादा हल्ला मचता है, वहाँ चुनाव के समय ४५ फीसदी मतदान होता है. जो लोग कतार में खड़े होके एक वोट डालने में आलस करते हैं, वोह क्रांति के लिए सड़कों पे उतरेंगे? दूसरी और तमिलनाडु की जनता ने ८० फीसदी से अधिक मतदान देके एक भ्रष्ट सरकार को बदला, हालांकि वहाँ इस क्रांति कि कोई लहर नहीं थी.
3. आप क्या स्वयम सडको पर उतरना चाहेंगे ?
नहीं.
3.1 यदि हाँ तो क्यों?
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3.2 यदि नहीं तो क्या आपको रोक रहा है ?
अव्वल तो आन्दोलन में मेरी आस्था कम ही है. अधिकतर आन्दोलन या तो hijack हो जाते हैं या गुमराह. पर अगर कोई आन्दोलन जिसकी मांग से मैं मेल खाता हूँ और जो प्रजातंत्र में रहते हुए राजनीती में भाग लेता है, तो मैं उसका पूरा समर्थन करूंगा.
बाबा और अन्ना कि मांगों से मेरी सहमती नहीं है. मेरे विचार से भ्रष्टाचार का सबसे महत्त्वपूर्ण कारण है कि सरकार के अनेक और पेचीदे कायदे कानून. भारत में हर काम के लिए पचास अनुमतियाँ और सौ सरकारी लोगों के हस्ताक्षर लेने पड़ते हैं. जहां ऐसी कार्य प्रणाली होगी, वहाँ भ्रष्टाचार स्वाभाविक है. जिस खेल में नियम स्पष्ट और सरल नहीं होंगे, वहाँ बेईमानी तो होगी ही. अन्ना और बाबा की मांगों का इस बात से लेना देना नहीं है. प्रणाली मैं सुधार के बजाय (जो कि शायद सुनने मैं और बोलने मैं बोरिंग है) उनकी मांगें थोड़ी फिल्मों जैसी हैं जहां एक ईमानदार हीरो सब बेईमानों को नष्ट कर देता है. .नेताओं से क्रोधित जनता को "भ्रष्टाचार मिटाओ" का नारा बहुत लुभाता है, पर यह उतना ही प्रभावी है जितना कि इंदिरा का "गरीबी हटाओ" नारा था.