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विषय : जाट समुदाय को हरियाणा राज्य में पिछडे वर्ग में आरक्षण --- गुरनाम सिंह आयोग की रिपोर्ट को बहाल करना तथा केंद्र को सिफारिस |
मान्यवर महोदय ,
हम जाट समाज को हरियाणा राज्य के पिछडे वर्ग में सम्मिलित करने की मांग निम्नलिखित संवैधानिक , कानूनी , सामाजिक व आर्थिक ठोस कारणों के आधार पर विस्तार से आपके सम्मुख पेश कर रहे हैं :-
देश स्वंतंत्र होने के बाद सामाजिक तौर पर पीड़ित अनुसूचित जाति व जनजातियों को आरक्षण का लाभ देने के लिए संविधान में प्रावधान किया जिसकी दस साल बाद समीक्षा होनी थी , लेकिन राजनैतिक कारणों से आज तक नहीं हो पाई | इसके अतिरिक्त अन्य पिछड़ी जातियों को आरक्षण देने के लिए भारत सरकार ने २० जनवरी 1953 को संविधान की धारा 340 के तहत काका केलकर की अध्यक्षता में कमीशन गठित किया जिसने अपनी रिपोर्ट 20 मार्च 1955 को सरकार को सौंप दी | लेकिन कमीशन अपनी रिपोर्ट में पिछड़ी जातियों की पहचान करने के लिए आर्थिक आधार व सामाजिक आधार विषयों पर उलझकर रह गया , जिस कारन यह रिपोर्ट संसद में प्रस्तुत नहीं हो पाई |
दूसरी पिछड़ी जातियों की आरक्षण की मांग लगातार उठती रही | परिणामस्वरूप भारत सरकार ने दूसरा पिछडा आयोग प्रथम जनवरी 1979 को बी० पी० मंडल की अध्यक्षता में गठित किया जिसने अपनी रिपोर्ट 31 दिसम्बर 1980 को सरकार को दी , जिसे 13 अगस्त 1990 को लागू किया | कमीशन ने पिछड़ी जातियों की पहचान करने के लिए धारा 15 (4) के तहत केवल दो ही शर्तों -- सामाजिक पिछडापन और शैक्षणिक पिछडापन को आधार माना | कमीशन ने आर्थिक आधार को शिरे से नकार दिया क्योंकि कमीशन का मानना था की जो व्यक्ति आज धनवान हैं वो कल निर्धन भी हो सकता हें फिर उसके लिए आरक्षण कैसे निर्धारित हो पायेगा | इसलिए केवल दो ही शर्तों के आधार पर मंडल कमीशन ने हरियाणा में भी अहीर , गुर्जर , सैनी , लौहार , कुम्हार , सुनार , खाती व कम्बोज जातियों को पिछडा मान कर 27 प्रतिशत आरक्षण का लाभ दिया गया |
लेकिन कमीशन ने हरियाणा की पिछड़ी जाति सूचि के पृष्ठ 311 क्रमांक 40 पर गुटका व चिल्लन जाट लिखा हैं , जबकि हरियाणा में इस नाम की कोई जाति नहीं हैं | इसी प्रकार क्रमांक 43 पर छिल्लर , पंवार , तंवर , तूड़ तथा क्रमांक 73 पर लाम्बा , सिहाग आदि जातियां लिखी हैं जो कोई जातियां नहीं होती ये सभी जाट जाति में तथा कुछ अन्य जातियों में पाए जाने वाले मात्र गोत्र हैं |
कमीशन ने पिछड़ी जाति की पहचान के लिए पहली शर्त सामाजिक पिछडेपन को माना जबकि कमीशन ने स्वयं अपनी रिपोर्ट के पृष्ठ 40 पर एक संदर्भ में लिखा हैं की " अहीर , कुर्मी , कौहारी व जाट आदि पिछड़ी जातियों ने अपना एक राजनीतिक मंच बनाया और चौधरी चरणसिंह सन् 1952 में पिछडे वर्ग से पहली बार मंत्री बने | इस प्रकार कमीशन ने भी स्वयं जाट जाति को भी पिछडा माना | इसके अतिरिक्त ज़मीनी हकीक़त हैं की जाटों का सामाजिक स्तर पिछड़े वर्ग की जातियां अहीर , गुर्जर , सैनी , लौहार , कुम्हार , सुनार , खाती व कम्बोज आदि के बराबर हैं | इसी कारन जाट जाति का इनके साथ हुक्का - पानी ही नहीं रसोई तक का आपसी सम्बन्ध हैं , जबकि सामान्य वर्ग की उच्च जातियां ब्राह्मण , बनिया , अरोड़ा खत्री , कायस्थ , राजपूत आदि पौराणिक कारणों से जाटों के सामाजिक स्तर को नीचा मानते आये ( भविष्य पूराण , पदम् पूराण , अल्बेरुनीज इंडिया , चचनामा व लाहौर हाई कोर्ट का 1936 का फैसला |
इन्ही तथ्यों के मद्देनजर अखिल भारतीय जाट महासभा ने 13 मार्च 2008 को राष्ट्रिय पिछडा आयोग के सामने अपना दावा पेश किया तथा 7 जून 2008 को हल्फनामे भी प्रस्तुत कर दिए | ये किसी भी संदेह से परे प्रमाणित हैं की पुरे देश में जाटों का आपसी सामाजिक स्तर समान हैं | लेकिन दिल्ली , उत्तरप्रदेश , राजस्थान , मध्यप्रदेश व हिमाचलप्रदेश के जाटों को पिछड़ी जाति मानकर आरक्षण दे दिया | लेकिन हरियाणा , पंजाब व जम्मू क्षेत्र के जाटों अगड़ी जाति मान गया | जबकि जाट का अलग अलग राज्य में रहना उनकी मर्ज़ी नहीं , यह राजनीतिक बंटवारा हैं | जाटों का आपसी सामाजिक स्तर समान होने के कारण ही सभी जाटों की पडोसी राज्यों में आपसी रिश्तेदारियां हैं | इसलिए स्पष्ट हैं की हरियाणा का जाट सामाजिक पिछडेपन की पहली शर्त को पूर्णतया पूरी करता हैं |
कमीशन की दूसरी शर्त जाति का शैक्षणिक तौर पर पिछडा होना हैं | कमीशन ने अपनी रिपोर्ट के पृष्ठ 44 पर लिखा हैं की उसने सभी राज्यों से जातिवार शिक्षा के आकड़े मांगे लेकिन किसी भी राज्य ने आकड़े उपलब्ध नहीं करवाए | इसलिए कमीशन का मानना हैं की ग्रामीण श्रमिक तथा किसानी जातियां शैक्षणिक तौर पर पिछड़ी हैं | हरियाणा में आज भी 90 प्रतिशत से अधिक जाट गाँव में रहकर किसानी करते हैं | कमीशन ने अपनी रिपोर्ट के पृष्ठ 28 पर एक शहरी लड़का मोहन तथा ग्रामीण लड़का लालू जिसके पिता के पास 4 एकड़ ज़मीन हैं का उदाहरण देकर सिद्ध किया की ग्रामीण लड़का शैक्षणिक तौर पर पिछडा ही होगा | हरियाणा में सन् 2001 में 67 प्रतिशत किसान ऐसे थे जिनके पास ज़मीन 5 एकड़ से भी कम थी | ये संख्या आज लगभग 80 प्रतिशत का आंकडा पार कर चुकी हैं और इन हरियाणा के किसानो में 70 प्रतिशत से भी अधिक जाट किसान हैं | इसलिए इन तथ्यों से प्रमाणित हैं की हरियाणा का जाट पिछडेपन की दूसरी शर्त भी पूर्णतया पूरी करता हैं | हलाँकि संविधान व कमीशन के अनुसार पिछडेपन के लिए कोई आर्थिक आधार नहीं हैं , केंद्र सरकार ने किसानो की बदतर हालत पर तरस खाते हुए 60 हज़ार करोड़ रूपये के क़र्ज़ मांफ किये | फिर हरियाणा के ग्रामीण किसान जाट की आर्थिक हालत कैसे बेहतर कही जा सकती हैं ? जबकि हरियाणा की बाकी सभी बड़ी किसान जातियों को पिछडा मानकर आरक्षण का लाभ दिया जा चूका हैं | गुरनाम सिंह आयोग की रिपोर्ट के तहत तत्कालीन मुख्यमंत्री मा० हुकम सिंह के काल में हरियाणा सरकार के आदेश पत्र क्रमांक w s c b d --- h r 299 --- s w (1) 91 दिनांक 05 - 02 - 1991 के तहत अहीर , गुर्जर , मेव , जाट , सिक्ख जाट , बिश्नोई , सैनी , रोड़ , त्यागी व राजपूत कुल दस जातियों को पिछडा जाति घोषित किया | लेकिन उसके बाद सरकार बदलने पर तत्कालीन मुख्यमंत्री भजन लाल के समय राजनीतिक द्वेष के चलते बिना कारण बतलाय जाट व पांच अन्य जातियों को अपने नोटीफिकेशन क्रमांक 1170 --s व (1) 95 दिनांक 07 - 06 - 1995 के तहत सूचि से बाहर कर दिया तथा लोढा जाति को सम्मलित कर लिया | इस प्रकार कुल पांच जातियां अहीर , गुर्जर , सैनी , मेव तथा लोढा को पिछड़ी जातियों की सूचि में रखा | जबकि गुरनाम सिंह आयोग की रिपोर्ट में जाट जाति को अहीर तथा सैनी जाति से अधिक पिछडा दिखाया गया था | लेकिन जाट समुदाय तथा पांच अन्य जातियों को सूचि से बाहर करना , जाट समुदाय तथा इन जातियों के साथ सरासर अन्याय था |
किसी राज्य में किसी जाति विशेष का मुख्यमंत्री होना आरक्षण के लिए मापदंड नहीं यदि ऐसा होता तो अहीर जाति को केंद्र व अभी राज्यों में आरक्षण नहीं मिलता क्योंकि इस जाति से हरियाणा , दिल्ली , उत्तरप्रदेश , बिहार , व मध्यप्रदेश में बार - बार मुख्यमंत्री रह चुके हैं | आज देश के सबसे बड़े राज्य उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री सुश्री मायावती दलित जाति से हैं , इसका अर्थ यह नहीं की दलित जाति का आरक्षण समाप्त कर दिया जाये | जाट जाति का किसी के आरक्षण से विरोध नहीं | माननीय उच्चतम न्यायलय की आरक्षण की 50 प्रतिशत सीमा तथा क्रीमीलेयर का जाट जाति पूरा सम्मान करती हैं | कोई एक भी कारण नहीं के हरियाणा के जाट को पिछड़ी जाति न माना जाये | इसलिए उपरोक्त तथ्यों से यह स्पष्ट हैं की जाट जाति को पिछड़ी जाति मानकर 27 प्रतिशत आरक्षण में शामिल किया जाना न्याय की कसौटी पर पूर्णतया न्याय संगत हैं | जाट जाति को अलग से कोई आरक्षण नहीं चाहिए |
हम यह भी कहना चाहते हैं की हमारी मांग को राजस्थान के गुर्जर समाज की आरक्षण की मांग से जोड़कर न देखा जाये क्योंकि गुर्जर जाति का राजस्थान व हरियाणा में ही नहीं अपितु केन्द्रिये स्तर पहले से पुरे देश में आरक्षण हैं , लेकिन राजस्थान का गुर्जर तो अपने कुछ निजी कारणों से पिछड़ी जाति के आरक्षण से निकलकर ( st ) के आरक्षण में जाना चाहता हैं | जिसकी मांग गुर्जर समाज सन् 1978 से उठता रहा हैं | जिसमे कुछ संवैधानिक अडचनों के कारण ऐसा नहीं हो पाया और अभी उनको अलग से 5 प्रतिशत आरक्षण राजस्थान सरकार ने दिया , उसका भी जाट समाज समर्थन करता हैं तथा इनकी मांग को पूर्णतया जायज मानता हैं | ............................................