Inspirational stories

विधि का लेख




एक दिन यमदुत एक मनुष्य के प्राण हरण करने
आया, तो उस व्यक्ति ने कहा: मुझे आप के साथ
आना पङेगा?
यमदूत: निश्चित रूप से।

व्यक्ति : क्योँ?
यमदूत : मेरे पास एक लिस्ट है,उसमें तेरा नाम सबसे ऊपर है इसलिए तुझे मेरे साथ चलना पङेगा।


व्यक्ति : चलो ठीक है किन्तु मेरी एक इच्छा है कि हम यहाँ दोनों साथ में खाना खाकर जायेंगे।
यमदूत : ठीक है।



( वो व्यक्ति यमदूत से दृष्टि चुराकर खाने में नींद की गोलियां मिला देता है।)
खाना खाने के पश्चात यमदूत को जोरदार नींद आ जाती है और वो वहीं सो जाता है, वो व्यक्ति अवसर का लाभ उठाकर
लिस्ट में से अपना नाम उपर से काटकर सबसे नीचे लिख देता है।


जब यमदूत नींद से उठता है तो कहता है, हे मानव! तेरा भोजन बहुत स्वादिष्ट था। मैं तुझसे बहुत प्रसन्न हूँ। अब मैं पहले तुझे नही लिस्ट में सबसे नीचे
वाले व्यक्ति को ले जाने से स्टार्ट करुंगा।



Moral- मृत्यु को कोई नही टाल सकता, वो अवश्यम्भावी है। विधि का जो लेख है वो होकर ही रहेगा।


 
[h=5][/h][h=5]फ्राँस के राजा हेनरी चतुर्थ घोड़े पर सवार होकर कहीं जा रहे थे। उनका अंगरक्षक भी साथ था। तभी उन्हें एक भिक्षुक मिला, जिसने अपना हैट उतारकर उनका अभिवादन किया। राजा ने भी अपना हैट उतारकर उसके अभिवादन का प्रत्युत्तर दिया।[/h][h=5]यह सब देख रहे उनके अंगरक्षक ने पूछा - "महाराज क्या ये उचित है कि एक राजा अपना हैट उतारकर किसी भिक्षुक का अभिवादन करे?"[/h][h=5]इसपर राजा ने कहा - "यदि मैं अभिवादन न करता तो मेरी आत्मा मुझे धिक्कारती कि फ्राँस के राजा में भिखारी जितनी भी सभ्यता नहीं है।"[/h]
 
एक धनवान पिता अपने पुत्र को भारत की निर्धनता दिखाने के लिये एक ग्राम में ले गया ! ग्राम भ्रमण के पश्चात पिता ने निर्धनों के बारे में पूछा।

पुत्र बोला : हमारे पास एक कुत्ता है और ग्रामीणों के पास चार-चार।
हमारे पास छोटा सा स्वीमिँग पूल है और उनके पास लम्बी नदी।


हमारे पास बल्ब ट्यूबलाईट है और उनके पास चन्द्रमा एवं अनगिनत तारे।


हमारे पास भूमि का एक छोटा सा टुकड़ा है और उनके पास बड़ा।


हम स्वयं अपना कार्य नहीं कर पाते, हमारे पास कार्य करने के लिये सेवक हैं और वो अपना कार्य भी करते हैं एवं दूसरों का भी।

हम अन्न खाते हैं और वो उगाते हैं।

हमारे पास सुरक्षा के लिये मकान है और उनके पास मित्र।

पिता निरुत्तर था

तब पुत्र बोला :"हम कितने निर्धन हैं? ये दिखाने के लिये आपका अनेक-अनेक धन्यवाद पापा !
 
एक कृषक को ग्राम के साहूकार से कुछ धन उधार लेना पड़ा। वृद्ध साहूकार बहुत काईयाँ एवं धूर्त था, उसकी कुदृष्टि कृषक की अत्यंत सुन्दर पुत्री पर थी। अतः उसने कृषक से एक सौदा करने का प्रस्ताव रखा। उसने कहा कि यदि किसान अपनी पुत्री का विवाह साहूकार से कर दे तो वो उसका सारा ऋण क्षमा कर देगा। कृषक और उसकी पुत्री साहूकार के इस प्रस्ताव से कंपकंपा उठे।

तब साहूकार ने उनसे कहा कि ठीक
है,अब ईश्वर को ही यह मामला निश्चित करने देते हैं। उसने
कहा कि वो दो पत्थर उठाएगा,एक काला और एक श्वेत तथा उन्हें एक खाली थैले में डाल देगा। तत्पश्चात कृषक की पुत्री को उसमें से एक पत्थर उठाना होगा:-
१-यदि वो काला पत्थर उठाती है तो वो मेरी पत्नी बन जायेगी और किसान का सारा ऋण चुकता हो जाएगा.
२-यदि वो श्वेत पत्थर उठाती है तो उसे साहूकार से विवाह करने की आवश्यकता नहीं रहेगी और फिर भी कृषक का ऋण चुकता माना जाएगा।
३-पर यदि वो पत्थर उठाने से मना करती है तो कृषक को जेल में डाल दिया जाएगा।

वो लोग कृषक के खेत में एक
पत्थरों से भरी पगडण्डी पर खड़े थे, जैसे ही वो बात कर रहे थे,
साहूकार ने नीचे झुक कर दो पत्थर उठा लिये, जैसे ही उसने पत्थर उठाये, चतुर पुत्री ने देख लिया कि उसने दोनों ही काले पत्थर उठाये हैं और उन्हें थैले में डाल दिया। तदनन्तर साहूकार
ने कृषक की पुत्री को थैले में से एक पत्थर उठाने के लिये कहा। अब कृषक की पुत्री के लिये
बड़ी कठिनाई हो गयी, यदि वो मना करती है तो उसके पिता को जेल में डाल दिया जाएगा,
और यदि पत्थर उठाती है तो उसे साहूकार से विवाह कर ना पड़ेगा ।
कृषक की पुत्री बहुत समझदार थी, उसने थैले में हाथ डाला और एक पत्थर निकाला, उसे देखे बिना ही घबराहट में पत्थरों से भरी पगडण्डी पर नीचे गिरा दिया, जहां वो गिरते ही अन्य पत्थरों के मध्य गुम हो गया।

"हाय, मैं भी कैसी अनाड़ी हूँ।" उसने कहा, " किन्तु कोई बात नहीं, यदि आप थैले में दूसरा पत्थर देखेंगे तो पता चल जाएगा कि मैंने कौनसा पत्थर उठाया था।" क्योंकि थैले में अभी दूसरा पत्थर है, किसान की पुत्री जानती थी कि थैली से केवल काला पत्थर निकलेगा और यहीमाना जायेगा कि उसने श्वेत पत्थर उठाया था और साहूकार भी अपनी कुटिल चाल को स्वीकार नहीं कर पाता इस प्रकार बुद्धिमान कृषक की पुत्री ने असंभव को संभवकर दिखाया।

moral-"बड़ी से बड़ी समस्या का भी समाधान होता है, बस हम उसे हल करने का कदम नहीं उठाते"l
जीवन में किसी भी प्रकार का संकट आये, उसका डटकर सामना करें।
 
एक 17 वर्ष का लडका सोचता है कि वह कठिन परिश्रम करेगा तथा बड़ा होकर करोड़पति बनेगा।
लडका कालेज पूरी करके नौकरी करने लगता है परन्तु उस छोटी सी नौकरी से घर का गुजारा नही होता है।
इसलिए उसने एक छोटा सा धन्धा चालू करने की सोची।
निरंतर परिश्रम के पश्चात भी धंधा बराबर नही चलता है।
फिर 3-4 धंधे बदलकर देखता है परन्तु उनमें भी मुँह की खानी पडती है।

उसको लगता है कि उसके भाग्य में कभी भी करोडपति बनना नही लिखा है।
ऐसे करते करते वो 35 वर्ष का हो जाता है।
पैसे कमाने के लोभ में उसे जुआ खेलने की लत लग जाती है।
और जितना कमाया था वह सब कुछ जुए में पराजित जाता है और सड़क पर आ जाता है।
और एक अत्यंत दयनीय भिखारी बन जाता है और भीख माँग कर खाता है और सड़क पर ही सो कर गुजारा करता है।
ऐसे करते करते वो 55 वर्ष का हो जाता है।
सब उसको पागल बोलने लगे, वह पागलों की तरह गाने गाता रहता था।
एक रात जब वह गाना गा रहा था तब वहाँ से चैनल V का रिपोर्टर निकलता है और उसका एक वीडियो बनाकर YOUTUBE पर अपलोड करता है।
उस विडियो को अच्छा रिस्पोन्स मिलता है, तो चेनल वालों ने पूरा एलबम बनाने का विचार किया।
और उस भिखारी को एक वर्ष के लिए एक करोड़ डॉलर में साईन कर लेते हैं।
अंततोगत्वा 56 वर्ष का होता है तब वह करोडपति बनता है।
(अमेरिका की सच्ची घटना )



moral:- भाग्य से अधिक और समय से पहले
ना किसी को मिला है और ना ही मिलेगा।
 
.................... स्वयं को टटोलें ............................

दो व्यक्ति यात्रा पर निकले .... दोनों की भेंट हुई ..!
दोनों यात्रा में साथ हो गए। सात दिन पश्चात दोनों के पृथक होने का समय आया तो एक ने कहा :
'भाईसाहब! एक सप्ताह तक हम दोनों साथ रहे .... क्या आपने मुझे पहचाना?' दूसरे ने कहा, 'नहीं, मैंने तो नहीं पहचाना।' वह बोला, 'क्षमा करें मैं एक नामी ठग हूं। परन्तु आप तो महाठग हैं। आप मेरे भी गुरु निकले।'

'कैसे?' 'कुछ पाने की आशा में मैंने निरंतर सात दिन तक आपकी तलाशी ली, मुझे कुछ भी नहीं मिला। इतनी बड़ी यात्रा पर निकले हैं तो क्या आपके पास कुछ भी नहीं है? बिल्कुल खाली हाथ हैं?'

'नहीं, मेरे पास एक बहुमूल्य हीरा है और थोड़ी-सी रजत मुद्राएं।'

'तो फिर इतने प्रयत्न के पश्चात वह मुझे मिली क्यों नहीं?'

'बहुत सीधा और सरल उपाय मैंने काम में लिया। मैं जब भी बाहर जाता, वह हीरा और मुद्राएं तुम्हारी पोटली में रख देता था। तुम सात दिन तक मेरी झोली टटोलते रहे। अपनी पोटली संभालने की आवश्यकता ही नहीं समझी। तुम्हें मिलता कहां से?'

कहने का अर्थ यह कि हम अपनी गठरी संभालने की आवश्यकता नहीं समझते। हमारी दृष्टि तो दूसरों के झोले पर रहती है। यही हमारी सबसे बड़ी समस्या है। अपनी गठरी टटोलें, अपने आप पर दृष्टिपात करें तो अपनी कमी समझ में आ जाएगी। यह समस्या सुलझा सकें तो जीवन में कहीं कोई रूकावट और उलझन नहीं आएगी ....!

इसलिए समय-समय पर स्वयं को अवश्य टटोलें ...!
 
एक धनी व्यक्ति था। अपने में मस्त - अपना जीवन अपना परिवार इतने तक सीमित था। सर्वथा अपने हित की बात ही सोचता रहता।


एक बार वह अपने दार्शनिक मित्र के घर गया और बोला - मित्र ! मुझे व्यवसाय में बहुत लाभ हुआ है। इन अतिरिक्त पैसों को कहाँ लगाऊं जिससे कि और अधिक धनवान बन जाऊँ।


यह सुनकर दार्शनिक उसे एक खिड़की के पास ले गए, जिसमें पारदर्शी शीशा लगा हुआ था। दार्शनिक बोले, तुम्हें क्या दिख रहा है ? धनि व्यक्ति बोला, मुझे बाहर सड़क पर जाते हुए सभी लोग दिख रहे हैं। इसके पश्चात दार्शनिक उसे अपने घर के एक आदमकद दर्पण के सामने ले गए और बोले, अब तुम्हें क्या दिख रहा है ? वह व्यक्ति बोला - स्पष्ट सी बात है कि इसमें मैं स्वयं ही दिखूंगा।


दार्शनिक ने समझाया- यह खिड़की के दर्पण की तरह साधारण शीशा है, पहले यह भी दूसरों को दिखाता था, किन्तु जब से इस पर कीमती पॉलिश लगा दी गई है, यह केवल देखने वाले को ही दिखाता है। इसी प्रकार तुम्हें भी पारदर्शी होना पड़ेगा, तब तुम्हें वे लोग भी दिखेंगे, जिन पर तुम अपने धन का सदुपयोग कर सकते हो - तभी तुम्हारे धन की सार्थकता है, नहीं तो आज संसार में पैसे तो कसाई, वैश्या, देशद्रोही भी कमाते है अतः धन की सार्थकता समझो कुछ सार्थक करो।


मित्रो मैं भी यही बात कहता हूँ स्वयं के बारे में तो सभी सोचते हैं, महान वह है जो दूसरों के हित में काम करता है।
 
एक पुराना बरगद का पेड़ था, उस पेड़ की जडो के पास दो बिल थे | एक बिल में चूहा रहता था और दूसरे बिल में नेवला | पेड़ के बीच खोखली जगह में बिल्ली रहा करती थी उसी पेड़ की डाल पर उल्लू रहता था | बिल्ली, नेवला और उल्लू – तीनो चूहे पर निगाह रखते की कब वह पकड़ में आए और वे उसे खाए | उधर बिल्ली चूहे के अलावा नेवला तथा उल्लू पर भी निगाह रखती थी कि इनमे से कोई मिल जाए | इस प्रकार बरगद में रहने वाले ये चारो प्राणी शत्रु बनकर रहते थे |

चूहा और नेवला बिल्ली के डर से दिन में बाहर न निकलते | केवल रात में भोजन की तलाश करते, उल्लू तो रात में ही निकलता था | उधर बिल्ली इन्हें पकड़ने के लिए रात में भी चुपचाप निकल पडती, सब सतर्कता बनाये रखते । एक दिन वहा एक बहेलिया आया, उसने खेत में जाल लगाया और चला गया | रात में चूहे की खोज में बिल्ली खेत में गयी और फँस गई - उसने जाल को नहीं देखा था | कुछ देर बाद दबे पांव चूहा उधर से निकला, उसने बिल्ली को जाल में फंसा देखा तो बहुत खुश हुआ | तभी न जाने कहाँ से धूमते हुए नेवला और उल्लू सामने आ गए | चूहे ने सोचा – ये दोनों मुझे नहीं छोड़ेगे - बिल्ली तो मेरी शत्रु है ही, अब क्या करूँ | उसने सोचा – इस समय बिल्ली मुसीबत में है, मदद पाने के लालच में शत्रु भी मित्र बन जाता है इसलिए इस समय बिल्ली की शरण में जाना चाहिए |

चूहा तुरंत बिल्ली के पास गया और बोला “मुझे तुम्हारी इस हालत पर दया आ रही है मैं जाल काटकर तुम्हे मुक्त कर सकता हूँ किन्तु मैं कैसे विश्वास करूँ कि तुम मित्रता का व्यवहार करोगी ?” बिल्ली ने कहा – “मुझे मालूम है तुम यहाँ क्यों आये हो क्योकि तुम्हारे दो शत्रु इधर ही आ रहे है | मुझे तुम्हारी आवश्यकता है अतः तुम मेरे पास आकर छिप जाओ, मैं तुम्हे मित्र बनाकर छिपा लूगी |”

चूहा बिल्ली के पास छिप गया, उधर नेवला और उल्लू भी घूमते धूमते आगे निकल गए | बिल्ली से कहा – “आज से तुम मेरे मित्र हो, अब जल्दी से जाल काट दो - सवेरा होते ही बहेलिया यहाँ आ जाएगा |” चूहे ने जाल काट दिया और भागकर फिर से बिल में छिप गया, बिल्ली भी मुक्त होकर आ गई | उसने चूहे को आवाज दी – “अरे मित्र ! बाहर आओ - अब डरने कि क्या बात है ?” चूहा बोला – “मैं तुम्हे खूब जानता हूँ, शत्रु केवल मुसीबत में फंसकर ही मित्र बनता है बाद में वह फिर शत्रु बन जाता है | मैं तुम पर विश्वास नहीं कर सकता |“
 
एक भिखारी भीख मांगने निकला। उसका सोचना था किजो कुछ भी मिल जाए, उस पर अधिकार कर लेना चाहिए। एक दिन वहराजपथ पर बढ़ा जारहा था। एक घर से उसे कुछ अनाज मिला। वह आगे बढ़ा और मुख्य मार्ग पर आ गया। अचानक उसने देखा कि नगर का राजा रथ पर सवार होकर उस ओर आ रहा है। वह सवारी देखने के लिए खड़ा हो गया, लेकिन यह क्या? राजा की सवारी उसके पास आकर रुक गई। राजारथ से उतरा और भिखारी के सामने हाथ पसारकर बोला- मुझे कुछ भीख दो। देश पर संकट आने वाला हैऔर पंडितों ने बताया है कि आज मार्ग में जो पहला भिखारी मिले, उससे भीख मांगें तो संकट टल जाएगा। इसलिए मना मत करना। भिखारी हक्का-बक्का रह गया। राजा, देश के संकट को टालने केलिए उससे भीख मांग रहा है। भिखारी ने झोली में हाथ डाला, तो उसकी मुट्ठी अनाज से भर गई। उसने सोचा इतना नहीं दूंगा। उसने मुट्ठी थोड़ी ढीली की औरअनाज के कुछ दानेभरे। किंतु फिर सोचा कि इतना भी दूंगा तो मेरा क्या होगा? भिखारी घर पहुंचकर पत्नी से बोला- आज तो अनर्थ हो गया। मुझे भीख देनी पड़ी। पर न देता तो क्या करता। पत्नी ने झोली कोउल्टा किया तो उसमें एक सोने कासिक्का निकला। यह देखकर भिखारी पछताकर बोला- मैंने राजा को सभी कुछ क्यों न दिया? यदि मैंने ऐसा किया होता तोआज मेरी जीवनभर की गरीबी मिट जाती। इस प्रतीकात्मक कथा का संकेत यह है कि दान देने से संपन्नता हजार गुना बढ़ती है। यदि हम हृदय की सारी उदारता से दान करें, तो प्रतिफल में दीर्घ लाभ की प्राप्ति होती है।
 
दो हट्टे-कट्टे युवा सन्यासी संध्या को अपने आश्रम की ओर लौट रहे थे। वे गेरुए वस्त्रों में और नंगे पैर थे। थोड़ी देर पहले ही वर्षा हुई थी और सड़कों पर जगह-जगह जल भर गया था। अकस्मात उनकी दृष्टि एक सुंदर युवती पर पड़ी, जो नए कपड़े पहनकर कहीं जा रही थी। वह सड़क पार करने की चेष्टा कर रही थी, किन्तु चूंकि सड़क पर अधिक पानी भरा हुआ था इसलिए सड़क पार नहीं कर पा रही थी।

उसे असमंजस में देख एक संन्यासी ने दूसरे से कहा- हमें उसकी सहायता करनी चाहिए।

दूसरा बोला- परन्तु हम तो सन्यासी हैं, वह लड़की, पहला संन्यासी उसकी बात को अनदेखा करके उस युवती के पास पहुंच गया और बोला - मैं आपको सड़क पार करा देता हूं। युवती ने अनुमति दी तो उस संन्यासी ने लड़की को गोद में उठाकर सड़क पार करा दी।

साँय को जब दूसरा संन्यासी पहले संन्यासी से मिला, तो वह बोला - तुमने उस लड़की को अपनी गोद में उठाया था, जबकि संन्यासियों को महिलाओं को छूना भी नहीं चाहिए, तुमने ऐसा क्यों किया ?

तो पहला संन्यासी बोला - मैंने तो उस युवती को उठाकर सड़क के दूसरी ओर छोड़ दिया था किन्तु लगता है तुम उसे अब भी उठाए हुए हो। तुम भी उसे छोड़ दो।



तो अच्छे आचरण के लिए दिखावा करने के स्थान पर मानसिकता का शुद्ध होना अति आवश्यक है।
 
एक दिन चाणक्य का एक परिचित उनके पास आया और उत्साह से कहने लगा, 'आप जानते हैं, अभी-अभी मैंने आपके मित्र के बारे में क्या सुना?'

चाणक्य अपनी तर्क-शक्ति, ज्ञान और व्यवहार-कुशलता के लिए विख्यात थे। उन्होंने अपने परिचित से कहा, 'आपकी बात मैं सुनूं, इसके पहले मैं चाहूंगा कि आप त्रिगुण परीक्षण से गुजरें।'

उस परिचित ने पूछा, ' यह त्रिगुण परीक्षण क्या है?'

चाणक्य ने समझाया , ' आप मुझे मेरे मित्र के बारे में बताएं, इससे पहले अच्छा यह होगा कि जो कहें, उसे थोड़ा परख लें, थोड़ा छान लें। इसीलिए मैं इस प्रक्रिया को त्रिगुण परीक्षण कहता हूं। इसकी पहली कसौटी है सत्य। इस कसौटी के अनुसार जानना आवश्यक है कि जो आप कहने वाले हैं, वह सत्य है। आप स्वयं उसके बारे में अच्छी प्रकार से जानते हैं?'

'नहीं,' वह व्यक्ति बोला, 'वास्तव में मैंने इसे कहीं सुना था। स्वयं देखा अथवा अनुभव नहीं किया था।'

'ठीक है,' - चाणक्य ने कहा, 'आपको पता नहीं है कि यह बात सत्य है अथवा असत्य। दूसरी कसौटी है -' अच्छाई। क्या आप मुझे मेरे मित्र की कोई अच्छाई बताने वाले हैं?'

'नहीं,' उस व्यक्ति ने कहा। इस पर चाणक्य बोले,' जो आप कहने वाले हैं, वह न तो सत्य है, न ही अच्छा। चलिए, तीसरा परीक्षण कर ही डालते हैं ।'

'तीसरी कसौटी है - उपयोगिता। जो आप कहने वाले हैं, वह क्या मेरे लिए उपयोगी है?'

'नहीं, ऐसा तो नहीं है।' सुनकर चाणक्य ने अंतिम बात कह दी।' आप मुझे जो बताने वाले हैं, वह न सत्य है, न अच्छा और न ही उपयोगी, फिर आप मुझे बताना क्यों चाहते हैं?

बोध:जो लोग सदैव दूसरों की बुराई करके प्रसन्न होते हों। ऐसे लोगों से दूर ही रहें। क्योंकि वे कभी भी आपके साथ भी धोखा कर सकते हैं। जो किसी और का ना हुआ वो भला आपका क्या होगा?
 
कहाँ गए वो चाणक्य जो एक हजार चन्द्रगुप्त तैयार कर अखंड भारत की नीव रखते थे?

आज के महारथियों को युद्ध से पहले ही हथियार डालते हुए देख कर चन्द्रगुप्त और चाणक्य पर आधारित एक कहानी स्मरण हो आयी है जो संभवतः लोगों के टूटते हुए भरोसे को थोड़ी सी शक्ति प्रदान कर सके:-


एक बार चन्द्र गुप्त और चाणक्य पहाड़ की ऊँची चोटी पर स्थित किसी मंदिर में निर्धनों को भोजन करवाने गए। धार्मिक कार्य था इसलिए चन्द्र गुप्त ने अधिक सिपाहियों की सेना एकत्र ना करके मात्र कुछ सौ सिपाही साथ लिए और मंदिर की ओर चाणक्य को लेकर प्रस्थान कर गए।


वहाँ पहुँच कर वो कुछ लोगों को भोजन करवा ही रहे थे तब तक उनके किसी शत्रु को इस बात की सूचना मिल गयी कि आज चन्द्र गुप्त मात्र कुछ सौ सिपाहियों के ही साथ हैं और पहाड़ की चोटी पर स्थित मंदिर पर निर्धनों को भोजन करवा रहे हैं। शत्रु पक्ष ने चन्द्र गुप्त को मारने का अच्छा अवसर जानकार 5000 सिपाही साथ लिए और मन्दिर की ओर कूच कर गए।

चाणक्य को इस बात की जानकारी हुई कि शत्रुओं की सेना पहाड़ के नीचे उनके आगमन की प्रतीक्षा कर रही है और उनके नीचे जाते ही चन्द्र गुप्त को मार दिया जाएगा।चाणक्य ने अपनी सूझ बूझ का परिचय दिया और तुरंत भण्डार गृह में पहुंचे, वहाँ 10 हजार पत्तल रखी हुई थीं और उन्होंने उन पत्तलों को उठा कर उनपर थोड़ी थोड़ी सी खिचड़ी और सब्जी लगवा कर कुछ लोगों से पहाड़ की चोटी के नीचे फिंकवाना प्रारम्भ कर दिया जब ऊपर से शत्रु पक्ष ने इतनी पत्तलें गिरती हुई देखीं तो उसे लगा कि ऊपर तो हजारों व्यक्ति भोजन कर रहे हैं, उसे चन्द्र गुप्त के साथ सैनिकों और ऊपर स्थित लोगों की संख्या गलत बताई गयी है। ऊपर तो लगभग 10 हजार व्यक्ति हैं और यदि सबने मिलकर हम पर आक्रमण कर दिया तो हमारे 5000 सैनिक भी कुछ ना कर पायेंगे और वो वहाँ से भाग खड़े हुए।

इस कहानी को सुनाने का उद्देश्य मेरा मात्र इतना है कि युद्ध योद्धाओं की अधिक संख्या से नहीं अपितु उचित रणनीति, कूटनीति और आत्मबल से जीते जाते हैं।

(कुलदीप शर्मा)

 
एक बहुत बड़ी कंपनी के कर्मचारी लंच टाइम में जब वापस लौटे, तो उन्होंने नोटिस बोर्ड पर एक सूचना देखी। उसमे लिखा था कि कल उनका एक साथी गुजर गया, जो उनके विकास को रोक रहा था। कर्मचारियों को उसको श्रद्धांजलि देने के लिए बुलाया गया था।

श्रद्धांजलि सभा कंपनी के मीटिंग हॉल में रखी गई थी। पहले तो लोगो को यह जानकर दुःख हुआ कि उनका एक साथी नही रहा, तदन्तर वो उत्सुकता से सोचने लगे कि यह कौन हो सकता है? धीरे धीरे कर्मचारी हॉल में जमा होने लगे। सभी के होठों पर एक ही प्रश्न था! अन्ततः वह कौन है, जो हमारे विकास के मार्ग में बाधा बन रहा था।

हॉल में दरी बिछी थी और दीवार से कुछ पहले एक परदा लगा हुआ था। वहाँ एक और सूचना लगी थी कि गुजरने वाले व्यक्ति का चित्र र परदे के पीछे दीवार पर लगा है। सभी एक एक करके परदे के पीछे जाएँ, उसे श्रद्धांजलि दें एवं फिर विकास के मार्ग में अपने कदम बदाये। क्योंकि उनके मार्ग को रोकने वाला अब चला गया। कर्मचारिओं के मुख पर अचरज के भाव थे। कर्मचारी एक एक करके परदे के पीछे जाते और जब वे दीवार पर टंगे चित्र को देखते, तो अवाक हो जाते।


वास्तव में दीवार पर चित्र के स्थान पर एक दर्पण टंगा था। उसके नीचे एक पर्ची लगी थी। जिसमें लिखा था "संसार में केवल एक ही व्यक्ति है, जो आपके विकास को रोक सकता है, आपको सीमओं में बाँध सकता है ! और वह आप स्वयं हैं।"


अपने नकारात्मक हिस्से को श्रद्धांजलि दे चुके 'नए' साथियों का स्वागत है।






 
एक प्रसिद्द मठ के मठाधीश ने मठ में पढ़ने वाले विद्यार्थियों के लिए विदाई समारोह में एक सामान्य ज्ञान प्रतियोगिता आयोजित की। सभी विद्यार्थियो ने बड़ी तन्मयता से प्रश्नपत्र पढ़ा और हल किया, सभी के द्वारा एक प्रश्न ही छोड़ा गया।


"नित्य भोर में विद्यालय की सफाई करने वाले पुरुष का क्या नाम है?"

सभी विद्यार्थियो को यह प्रश्न एक तरह का परिहास लगा और उन्होंने इसका बड़ा मज़ाक बनाया । सभी विद्यार्थी जो मठ में अध्ययन करने आते थे उन्होंने उस पुरुष कर्मचारी को कई बार देखा था। वह नाटा सा, दुर्बल सी देह दृष्टि वाला एक प्रौढ़ पुरुष था, परन्तु कभी किसी ने उसका नाम नहीं पूछा ना ही उसका नाम पता करने की चेष्टा की ? प्रश्नपत्र समाप्त होने के पहले कई विद्यार्थियो ने पूछा कि क्या अंतिम प्रश्न को सामान्य ज्ञान की श्रेणी में रखना उचित है?



अंत में सभागार में प्रतियोगिता का परिणाम घोषित करते हुए मठाधीश ने अपना वक्तव्य दिया "निश्चित रूप से ! अपने जीवन में आप सबकी कई व्यक्तियों से भेंट होगी, वे सभी महत्त्वपूर्ण हैं। वे सभी तुमसे ध्यानाकर्षण और देखभाल चाहते हैं, उन्हें देख मुस्कराना और अभिवादन करना ही पर्याप्त होगा। यही विनम्रता और बड़प्पन का मूलमंत्र है, आपके पद से आप बाद में पहचाने जाओगे - पहले आप एक साधारण मनुष्य हो ।"




अब सभागार तालियों से गूंज रहा था और प्रत्येक विद्यार्थी अपने साथ नया पाठ ले जा रहा था।
 
एक मछुआरा था । उस दिन प्रभात से संध्या तक नदी में जाल डालकर मछलियाँ पकड़ने की चेष्टा करता रहा, परन्तु एक भी मछली जाल में ना फँसी।
जैसे -जैसे सूर्य अस्त होने लगा, उसकी निराशा गहरी होती गयी। भगवान का नाम लेकर उसने एक बार और जाल डाला। पर इस बार भी वह असफल रहा। पर एक वजनी पोटली उसके जाल में अटकी। मछुआरे ने पोटली निकाली और टटोला तो झुंझला गया और बोला -' हाय ये तो पत्थर हैं !' फिर मन मारकर वह नाव में चढा।


बहुत निराशा के साथ कुछ सोचते हुए वह अपनी नाव को आगे बढाता जा रहा था और मन में आगे की योजनाओं के बारे में सोचता चला जा रहा था। सोच रहा था 'कल दूसरे किनारे पर जाल डालूँगा। सबसे छिपकर, उधर कोई नही जाता, वहां बहुत सारी मछलियाँ पकड़ी जा सकती हैं।'


मन चंचल था तो फिर हाथ कैसे स्थिर रहता ?



वह एक हाथ से उस पोटली के पत्थर को एक-एक करके नदी में फेंकता जा रहा था। पोटली खाली हो गयी। जब एक पत्थर बचा था तो अनायास ही उसकी दृष्टि उस पर गयी तो वह स्तब्ध रह गया।


उसे अपने आँखों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था। यह क्या? ये तो ‘नीलम ’ था।

मछुआरे के पास अब पछताने के अतिरिक्त कुछ नही बचा था। नदी के बीचों-बीच अपनी नाव में बैठा वह केवल अब अपने को कोस रहा था।

Moral----- प्रकृति और प्रारब्ध किसी ना किसी रूप में ऐसे ही ना जाने कितने नीलम हमारी झोली में डालता रहता है जिन्हें पत्थर समझ हम ठुकरा देते हैं।


 
जीवन में सीखने कि लिए सदैव तत्पर रहना चाहिये। एक ट्रक ड्राइवर अपने सामान की डिलीवरी करने के लिए मेंटल हॉस्पिटल गया। सामान डिलीवरी करने के पश्चात वापस लौटते समय उसने देखा कि उसके ट्रक का एक पहिया पंक्चर हो गया। ड्राइवर ने स्टेपनी निकाल कर पहिया खोला पर त्रुटिवश उसके हाथ से पहिये कसने के चारों बोल्ट पास की गहरी नाली में गिर गए। जहाँ से निकालना संभव न था। अब ड्राइवर बहुत ही परेशान हो गया कि वापस कैसे जाए?

इतने में पास से मेंटल हॉस्पिटल का एक रोगी गुजरा। उसने ड्राइवर से पूछा कि क्या बात है? ड्राइवर ने रोगी को बहुत ही हिकारत से देखते हुए सोचा कि यह पागल क्या कर लेगा?


फिर भी रोगी को पूरी बात बता दी। रोगी ने ड्राइवर के ऊपर हँसते हुए कहा कि तुम इतनी छोटी सी समस्या का समाधान भी नहीं कर सकते हो और
इसीलिये तुम ड्राइवर ही हो।


ड्राइवर को एक पागलपन के मरीज से इस प्रकार का संबोधन अच्छा नहीं लगा और उसने रोगी से चेतावनी भरे शब्दों में पूछा कि तुम क्या कर सकते हो?


रोगी ने उत्तर दिया कि बहुत ही साधारण बात है। शेष तीन पहियों से एक एक बोल्ट निकाल कर पहिया कस लो और फिर निकट की ऑटो पार्ट्स की दुकान के पास जाकर नए बोल्ट खरीद लो।



ड्राइवर इस सुझाव से बहुत ही प्रभावित हुआ और उसने रोगी से पूछा कि तुम इतने बुद्धिमान हो फिर इस हॉस्पिटल में क्यों हो?

रोगी ने उत्तर दिया कि, "मैं सनकी हूँ पर मूर्ख नहीं।"



कोई आश्चर्य की बात नहीं कि कुछ लोग ट्रक ड्राइवर की तरह व्यवहार करते हैं, सोचते हैं कि दूसरे लोग मूर्ख हैं।
अतः हम सब ज्ञानी और पढ़ें लिखे हैं, पर निरीक्षण करें कि हमारे आस् पास इस प्रकार के सनकी व्यक्ति भी रहते हैं
जिनसे ढेर सारे व्यावहारिक जीवन के नुस्खे मिल सकते हैं और जो हमारी बुद्धिमत्ता को ललकारते रहेंगे।



 
एक व्यक्ति ने देखा कि एक निर्धन बालक उसकी मूल्यवान कार को बड़े ध्यान से निहार रहा है। व्यक्ति ने उस बालक को कार में बिठा लिया।

लड़के ने कहा:- आपकी कार बहुत अच्छी है, बहुत मूल्यवान होगी ना ?

व्यक्ति :- हाँ, मेरे भाई ने मुझे गिफ्ट दी है।

बालक (कुछ सोचते हुए):- वाह ! आपके भाई कितने अच्छे हैं।


व्यक्ति :- मुझे पता है तुम क्या सोच रहे हो, तुम भी ऐसी कार चाहते हो ना ?

बालक :- नहीं ! मैं आपके भाई की तरह बनना चाहता हूँ।


 
एक गांव में एक व्यक्ति रहता था,जो जीवन में हर उस चीज को हासिल करना चाहता था,जिसे हासिल करने की क्षमता उसमें थी। वह अपनी इस इच्छा से अभिभूत था। वह सोते जागते, खाते पीते बस एक ही सपना देखता था कि वह मरने से पहले खुद को हर उस काम में श्रेष्ठ साबित कर ले,जो वह कर सकता है।


ऐसे बहुत से काम थे, जो वह कर सकता था, उसे लगता था कि पूरी दुनिया उसकी हो सकती है अगर वह इस ओर अपना ध्यान लगा ले। वह जानता था कि उसकी संभाविताएं असीमित हैं। वह जानता था कि वह किताबें लिख सकता था, अविष्कार कर सकता था, शक्ति एकत्रित कर सकता था और लाखों लोगों की जिन्दगियां बदल सकता था। वह हमेशा अपने भीतर एक शक्ति के साथ जीता रहा। उसके मार्ग में एक ही बाधा थी कि इन सभी कामों में खुद को श्रेष्ठ साबित करने के लिए उसके पास केवल एक जिन्दगी थी। उसे यह तय करना था कि उसे अपनी असीमित योग्यताओं को कहां इस्तेमाल करना है। यह निर्णय लेना बहुत मुश्किल था क्योंकि केवल एक को चुनने का मतलब था बाकी के विकल्पों से दूर होना।
इसी दौरान उसने अपनी पढ़ाई पूरी की, नौकरी की, शादी की और बच्चों का पालन- पोषण करने लगा और अपने खाली वक्त का हर मिनट उसने यह सोचने में बिताया कि वह अपनी सारी ताकत को कहां लगा सकता है ताकि वह श्रेष्ठ बन सके। बेशक जिस काम में उसने हांथ डाला वह उसमें सफल रहा। लोगों से भरपूर सम्मान भी मिला। इसी दौरान वह अपने आपको समझाता रहा कि एक बार जब वह अपनी पसंद पर खुदको केन्द्रित करेगा तो वह बहुत कुछ हासिल कर लेगा। समय बीतता रहा और उम्र बढ़ती रही। इस बीच कुछ रास्ते उसके लिए बन्द हो गये,लेकिन अभी भी बहुत कुछ था,जिसमें वह श्रेष्ठता हासिल कर सकता था। हर दिन वह काम करते हुए,बच्चों को बड़ा करते हुए और रोजमर्रा की समस्याओं को सुलझाते हुए,सोंचता रहता था कि उसमें अभी भी असीमित संभावनाएं हैं। ज्यादातर लोग जो उसे जानते थे, वे भी उसके बारे में यही राय रखते थे।


एक दिन उसे सीने में दर्द हुआ और वह घर जल्दी लौट आया। बड़ी मुश्किल से वह बाथरूम तक पहुंच पाया। अपने आप को कमजोर और खाली महसूस करते हुए,उसने खुद को शीशे में देखा। कमजोर,उत्साहहीन और सफेद बालों वाला व्यक्ति उसे शीशे में दिखाई दे रहा था उसकी आंखे लाल और थकी हुई थी, लेकिन अब भी उनमें बिना आजमाई हुई असीमित संभावनाएं मौजूद थीं। उसने इन आंखों में कुछ खोजा और अचानक उसका सामना इक सच से हुआ। सच बहुत सरल था कि लोग अपने आपको यह सोचकर खुश करते हैं कि अगर ऐसी या वैसी परिस्थिति न हुई तो वे अपने लक्ष्य में कामयाब होते। वास्तव में यह कुछ भी नहीं है, बल्कि एक भ्रम है।



जीवन में किसी भी पल जब तक आप स्वस्थ हों और युद्ध, अपराध या प्राकृतिक आपदाओं के बीच न हों तब तक आप वह चीज हासिल कर सकते हैं, जिसे आप पाना चाहते हैं। आपमें सिर्फ एक ही चीज का अभाव होता है, जो कि उस लक्ष्य तक पहुंचने की सबसे बड़ी जरूरत है। एक प्रयास,प्रतिभा,कुशलता,आत्मशक्ति, प्राथमिकताएं या कुछ और। चाहे यह बात आपको पसंद हो या नहीं, चाहे आप इसे माने न माने, लेकिन आपमें इनका अभाव होता है। अगले ही पल सीने में उठे दर्द ने उसकी सांसो को हमेशा के लिए रोक दिया।


श्रेष्ठता उससे केवल एक कदम दूरी पर थी। वह बहुत कुछ कर सकता था, लेकिन उसने पूरी जिन्दगी गंवा दी।
 
एक युवक कविताऐं लिखता था, किन्तु उसके इस गुण का कोई मूल्य नहीं समझता था। घर वाले भी उसे ताना मारते रहते थे कि तुम किसी काम के नहीं बस कागज काले करते रहते हो। उसके भीतर हीन भावना घर कर गई।

उसने एक जौहरी मित्र को अपनी ये व्यथा बताई। जौहरी ने उसे एक पत्थर देते हुए कहा- तनिक मेरा एक कार्य कर दो। ये एक मूल्यवान पत्थर है। कई प्रकार के लोगों से इसका मूल्य का पता लगाओ, बस इसे बेचना मत। युवक पत्थर लेकर चला।

वह पहले एक कबाड़ी वाले के पास गया। कबाड़ी वाला बोला- पाँच रुपये में मुझे ये पत्थर दे दो। फिर वह सब्जी वाले के पास गया। उसने कहा कि तुम एक किलो आलू के बदले मुझे ये पत्थर दे दो, इसे मैं बाट की तरह प्रयोग कर लूँगा। युवक मूर्तीकार के पास गया। मूर्तिकार ने कहा कि इस पत्थर से मैं मूर्ति बना सकता हूँ, तुम ये मुझे एक हजार में दे दो।

अंततः युवक वह पत्थर लेकर रत्नों के विशेषज्ञ के पास गया। उसने पत्थर को परखकर बताया- ये पत्थर अत्यंत मूल्यवान हीरा है, इसे तराशा नहीं गया। करोड़ों रुपये भी इसके लिए कम होंगे। युवक जब अपने जौहरी मित्र के पास आया, तब तक उसके भीतर से हीन भावना गायब हो चुकी थी और उसे एक संदेश मिल चुका था।


कथा-मर्म:- हमारा जीवन अनमोल है, तथा हर किसी के भीतर कोई ना कोई प्रतिभा छिपी है। आवश्यकता है तो बस उसे विशेषज्ञता के साथ परख कर उचित स्थान पर उपयोग करने की।
 
एक राजा था जिसकी प्रजा अच्छे भारतीयों की तरह सोई हुई थी!

बहुत से लोगों ने कोशिश की प्रजा जग जाए... अगर कुछ गलत हो रहा है तो उसका विरोध करे, लेकिन प्रजा को कोई फर्क नहीं पड़ता था!

राजा ने तेल के दाम बढ़ा दिए, प्रजा चुप रही... राजा ने अजीबो-गरीब टैक्स लगाए, प्रजा चुप रही... राजा ज़ुल्म करता रहा, लेकिन प्रजा चुप रही

एक दिन राजा के दिमाग में एक बात आई उसने एक अच्छे-चौड़े रास्ते को खुदवा के एक पुल बनाया जबकि वहाँ पुल की कतई ज़रूरत नहीं थी... प्रजा फिर भी चुप थी... किसी ने नहीं पूछा के भाई यहाँ तो किसी पुल की ज़रूरत नहीं है फिर आप क्यों बना रहे है?

अब राजा ने अपने सैनिक उस पुल पर खड़े करवा दिए और पुल से गुज़रने वाले हर व्यक्ति से टैक्स लिया जाने लगा। फिर भी किसी ने कोई विरोध नहीं किया!

फिर राजा ने अपने सैनिको को हुक्म दिया कि जो भी इस पुल से गुजरे उसको 4 जूते मारे जाए और एक शिकायत पेटी भी पुल पर रखवा दी कि किसी को अगर कोई शिकायत हो तो अपनी शिकायत लिखकर पेटी मे डाल दे... लेकिन प्रजा फिर भी चुप!

राजा रोज़ शिकायत पेटी खोल कर देखता कि शायद किसी ने कोई विरोध किया हो... लेकिन उसे हमेशा पेटी खाली मिलती !

कुछ दिनो के बाद अचानक एक एक चिट्ठी मिली... राजा खुश हुआ कि चलो कम-से-कम एक आदमी तो जागा!

जब चिट्ठी खोली गई तो उसमें लिखा था - "हुजूर जूते मारने वालों की संख्या बढ़ा दी जाए... हम लोगो को काम पर जाने मे देरी होती है
 
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