शेर जैसा आचरण या भेड़ जैसी मानसिकता !
जब युद्ध का बिगुल बजता हैं तो किसान अपने हथियारों से लैस होकर शत्रु का मुक़ाबला करने के लिए चल पड़ता हैं | उस में शेर के सभी गुण प्रकट हो जाते हैं | तोपों की गर्जना और तलवारों की चमक उसे भयभीत नहीं कर पाती | राइफल के बैनट की तीखी नोक उसे जंगल के कांटे से भी कम लगती हैं | बमों के विस्फोट से उत्पन्न भयंकर आवाज़ उसे कंपायमान नहीं कर सकती , और गोलियों का चलना उसके लिए वर्षा जैसे ही होता हैं ! वह शेर की तरह सीधा गोलियों के आने की दिशा में देखता हैं | जब वह अपने भाई के साथ लड़ता हैं तो उसकी खोपड़ी को तजबूज की भांति चूर-चूर कर देता हैं | लेकिन उसकी वीरता युद्ध के मैदान और भाई के साथ लड़ने तक ही सीमित रहती हैं | इन मौकों के अतिरिक्त वह शेर की भांति नहीं दहाड़ता बल्कि भेड़ की मानसिकता को भी मात दे डालता हैं | इसलिए इसमें शेर के गुणों का अभाव हैं , इन की अपूर्णता हैं | संस्कृत भाषा में राजसिक कहे जाने वाले इसके सारे गुण विलुप्त हो गए हैं , या कमजोर पड़ गए हैं | मैं किसान से पूछता हूँ कि वह शेर कि भांति रहना चाहता हैं या भेड़ कि भांति ? वह शेर कि दहाड़ को चुनेगा अथवा भेड़ के मिमियाने को ? वह शेर के गुणों का उपासक बनेगा या भेड़ सरीखी मानसिकता का ?
ओ किसान ! अगर तू मुझ से पुछेगा तो मैं तुझे शेर सरीखा बनने , और भेड़पने को तिलांजलि देने की सलाह दूंगा | मैं शेर के समस्त गुणों को संस्कृत के इस एक शब्द 'राजस' में समाहित हुए देखता हूँ | वीचार की दृष्टि से महानता के गुणों का महत्व राजसिक कर्मों द्वारा दर्शाया जाता हैं ; परंतु मैं निश्चयपूर्वक ऐसा नहीं कह सकता | पराकर्म , शौर्य , पुरुषार्थ , आत्म सम्मान का भाव , क्रियाशीलता , इच्छाशक्ति , बेचैनी और उदार दृष्टिकोण आदि कुछ ऐसे गुण हैं ; जिनका सीधा संबंध जीवनशक्ति के क्रियापरक सिद्धांतों के साथ हैं ; अर्थात क्रिया , ऊर्जा , उत्साह और जीवन के मूल्यों के साथ हैं | मैं इन्हे शेर जैसे गुण कहता हूँ | इस सभी गुणों ; अर्थात गुण-कर्म-स्वभाव को नकारने का नाम भेड़ जैसी मानसिकता हैं |
ओ किसान ! कायर मत बन , बहादुर बन ; भयभीत मत हो , भाय उत्पन्न करने वाला बन , दुर्बलता और बेचारगी , विवशता , शक्तिहीनता के वीचार को अपने दिमाग में मत घुसने दे ; शक्ति और समर्थता के वीचारों को मन में स्थान दे | खुद को नीचा और घृणित मत समझ , महान और सम्मानित मान कर चल | फिर दूसरे भी तेरा सम्मान करने लगेंगे | अपमान को सहन मत कर , आत्म-सम्मान करना सीख | लापरवाही , आलस , उदासीनता और जड़ता के भावों को दुत्कार कर बाहर कर दें , जागरूकता और सावधानी को अपना , आलस का शिकार मत बन , ऊंची भावनाए और आशावादी नजरिया बनाए रख ; मत सोच कि तू कुछ नहीं कर सकता | खुद को ताकत और कठोरता का भरपूर खजाना समझ | पहल करने कि हिम्मत , भावना और नियत को मत खो देना ! निराशा और हताशा के हालात में भी अपने उपलब्ध संसाधनों का भरपूर उपयोग करना सीख |
जोखिम उठाने वाला , परिश्रमी बन | आत्मा-संतुष्टि का अनुभव करना अपनी योग्यता को खो देना हैं | अपने विचारों में उम्मीद जगा , अपनी बुद्धि को चिंतन , मनन तथा प्रार्थना में लगा ; मन को जागृत रख | अपनी दृष्टि धरती पर टीका ; इस की दिशा आसमान की ओर मोड दे | धरती के साथ अपने भाग्य को क्यों जोड़ता हैं ; आसमान की ऊंचाइयों को लक्ष्य बना ; तू अपना ध्यान समुद्र की गहराइयों पर क्यों टिकाए बैठा हैं , पहाड़ों की ऊंचाइयों को देख !
ए किसान ! जरा सोच , क्या किसी कायर ने कभी नाम कमाया हैं ? क्या किसी आलसी ने कभी युद्ध जीता हैं ? क्या किसी हताश इंसान ने कोई महान काम किया हैं ? वे कौन लोग होते हैं जो मर कर भी जिंदा रहते हैं ? वे , जिनमें साहस और शुरुआत करने , पहल करने , नेतृत्व करने की क्षमता होती हैं | सिंहासन किन लोगो ने जीते हैं ? केवल उन्होने जो सिरों पर कफन बांध कर अपने देश से बाहर निकले हैं | बाबर ने चार बार भारत पर आक्रमण किया , परंतु निराश लौटना पड़ा | परंतु उसने दिन नहीं तोड़ा ! वह पाँचवी बार फिर लौट कर आया और एक ऐसे साम्राज्य की नींव डालने में सफल हुआ जो तीन सो वर्षों तक उस के उत्तराधिकारी के अधीन रहा | बाद मे अंग्रेज़ आए और भारतवर्ष पर कब्जा कर लिया | जिन लोगों ने आलस , लापरवाही और उदासीनता को अपनाया वे अपने पुरोखों द्वारा स्थापित साम्राज्य से हाथ धो बैठे | इब्राहिम लोधी और सिराजुदौला दोनों ने अपने अपने साम्राज्य खो दिये |
ओ किसान ! चारों ओर निगाह डाल कर देख | जंगल का राजा कौन हैं ? शेर या गीदड़ ? पक्षियों का राजा कौन हैं ? बाज या चिड़िया ? आकाश का राजा कौन हैं ? सूरज या चाँद ? तू इस सब से कोई सबक लेना नहीं चाहता !
शेर पशु का शिकार करता हैं , और उसके छक जाने के बाद जो थोड़ी बहुत जूठन बच जाती हैं उस पर गीदड़ हाथ साफ करता हैं | बाज का शिकार पक्षी हैं ; परंतु यह अपनी भूख मिटाने के लिए धरती पर मृत पड़ी हुई चिड़िया को नहीं उठाएगा ! सूर्य प्रकाश फेंकता हैं और चंद्रमा इसे प्रतिबिम्बित करता हैं | अब मुझे बताओ तुम किस स्थिति को चुनोगे ? शेर , गीदड़ , बाज अथवा चिड़िया की स्थिति को ? सूरज बनना चाहोगे या चाँद ?
साँप से हर कोई भय खाता हैं , और इसी तरह मगरमच्छ से भी ! जहां मगरमच्छों का निवास होना बताया जाता हैं वहाँ लोग पानी के भीतर रखते हुए डरते हैं ; स्त्री , पुरुष , युवा , बाल , वृद्ध , सब केवल उन्ही जगहों पर डुबकी लगाते हैं जहां मगरमच्छों के होने की आशंका नहीं होती | जब साँप को मार दिया जाता हैं तो बच्चे सब ओर से इस को ठोकरे लगाते हैं | तुम इस सब से क्या समझते हो ? इस से यही सिद्ध होता हैं कि जब तक तुम्हारे पास शक्ति हैं तब तक तुम्हें दूसरों से , खुद तुम्हारे अपने भीतर से भी , सम्मान मिलता हैं , लेकिन जब यह शक्ति नहीं रहती तो तुम सत्ता के साथ ही सम्मान से भी हाथ धो बैठते हो | लोग शासकों के समक्ष दंडवत प्रणाम करते हैं , अफसरशाहों को हर कोई सम्मान देता हैं , क्यों ? क्योंकि उनमे शक्ति हैं , शेर जैसे गुण हैं | और तुमने यह कहावत तो सुनी होगी : ' उतरा कुर्सी , मुर्दक नाम ' | जो कोई शेर जैसी शक्ति खो बैठता हैं , अपने सम्मान को भी खो देता हैं | परंतु किसान , तू यदि शेर-वृति अपनाना चाहता हैं तो तुझे अपने स्वभाव को बदलना पड़ेगा | अब तो तू दर्ता हैं , लुकता-छिपता हैं , खुद को नीचा महसूस करता हैं और खतरों को टालने की कोशिश करता हैं | खतरों के आभास मात्र से ही तू बेचैन हो उठता हैं , नुकसान से डरता हैं | इस सबका कारण तेरी भेड़-वृति और भेड़-चाल हैं | यदि शेर बनना चाहता हैं तो भय को त्याग दे | ऐसा सोच की भय नाम की कोई चीज हैं ही नहीं , यह तो केवल एक मिथ हैं | और यदि भय और जोखिम जैसी चीज कहीं हैं भी , तो उन का स्वागत कारों , उन के साथ खेलना सीखों , उन का सामना करो , उन्हे पराजित करो | जोखिम को अपने जीवन का अंग बना लो |
' अगर खुदाई हयात , अन्दर खतरे जी |'
(अगर तुझमे जीवन की , जीवंतता की प्रबल इच्छा हैं , तो खतरों में रहना सीख )
देखों , जोखिम उठाए बिना कुछ भी प्राप्त नहीं किया जा सकता | खतरों में से गुजरे बिना तुम कुछ नहीं पा सकते | तुम मोती चुनना चाहते हो , परंतु पानी के भीतर जाने से डरते हो !
' बदरियादार मुनाफा बेशुमार अस्त ,
दीगरख्वाही सलामत बर किनार अस्त '
(नदी मे डुबकी लगाना मुनाफे का सौदा हैं ; परंतु यदि तू जोखिम से बचना चाहता हैं तो फिर किनारे ही बैठा रह , मोती चुनने का इरादा छोड़ दे )
एक भेड़ -वृति इंसान के सम्मान , बड़प्पन , महानता , उत्थान आदि जीवनभूषणों की प्राप्ति नहीं हो सकती | यदि तुम्हें इस तरह की चीजों को पाने की इच्छा हैं तो अपने अन्दर शेर के गुणों का विकास करो | अगर तुम यह नहीं कर सकते तो उस दुनियाँ को छोड़ कर भाग जाओ - तुम्हारा जीवन दो कोड़ी का भी नहीं हैं ; तुम धरती पर अनचाहा बोझ हो , और तुम महज एक महत्वहीन व्यक्तित्व हो !
ए किसान ! मैं तुझे जीवंत अर्थात जीवनी - शक्ति से परिपूर्ण देखना चाहता हूँ | मैं तेरी प्रतिष्ठा को अक्षुष्ण बनाए रखना चाहता हूँ | लेकिन मैं इस गरिमा को भेड़ की मानसिकता के दलदल मे धंसा नहीं देखना चाहता | मैं तेरे गौरव को सुरक्षित बनाए रखने का इच्छुक हूँ , परंतु तेरे अस्तित्व को शेर के गुणों से युक्त देखना चाहता हूँ | इसलिए शेर-वृति का होना बहुत जरूरी हैं ; भेड़-वृति इन गुणों की प्राप्ति में बाधक हैं | परंतु वर्तमान में तुझ पर भेड़-वृति हवी हैं और शेर के गुणों का तुझ में नितांत अभाव हैं | मैं तुझ में शेर के गुण पैदा होते हुए देखने के लिए बेताब हूँ | मैं तेरा शुभचिंतक और हमदर्द भी हूँ , इस लिए सभी शुभ कामनाओं के साथ तुझे रोने-धोने की प्रवृति को छोडकर , कायरता का भाव त्याग कर , कठोरता और दृढ़ता को अपना लेने की सलाह देता हूँ | दासता के घृणित भाव को त्याग दे , और बहादुर स्वामी-भाव को धारण कर ले | हीन भावना को छोड़ कर आधिपत्य बनाए रखने के भाव को संजो ले | मरने से मत डर | घास मत बन , घोडा बन | शिकारी बन , शिकार नहीं | दलित मत बन , रक्षक बन | खुद को मजबूर मत बना रह , औरों का मददगार बन |
एक बात और ! ए किसान , इस संसार में कमजोर बनकर जीना बहुत बड़ा पाप हैं | यह दुनियाँ ताकत को सलाम करती हैं | आज की दुनियाँ में न्याय और अधिकार के औचित्य को सत्ता के पैमाने से नापा जाता हैं | देख बुद्धिमान इकबाल क्या कहता हैं :
" ज़िंदगी किस्त अस्त वा हासिल कुव्वत अस्त ,
शरह रमजे-हक वो बातिल कुव्वत अस्त ,
मुद्दई गरमयादरे-अज कुव्वत अस्त ,
दरवाह ओ बेनियाजे-अज हुज्जत अस्त "
( जीवन खेती के समान हैं ; शक्ति उसकी फसल हैं | झूठ और सच का भेद ताकत का लिहाज रखते हुए आंका जाता हैं | यदि दावेदार शक्तिशाली हैं , और उसके पास हुनर और कौशल हैं , तो उसे अपने दावे को सिद्ध करने के लिए किसी कानून का साक्ष्य गवाही की आवश्यकता नहीं होती | इसके लिए कोई तर्क अपेक्षित नहीं हैं | )