Shayri (Continued)

तेरे हर दुख को अपना बना लूँ..
तेरे हर गम को दिल सेलगा लूँ..
मुझे करनी आती नहीं चोरी वरना..
मैं तेरी आँखों से हर आँसू चुरालूँ......
 
जब भी सुलझाना चाहा, ज़िन्दगी के सवालों को मैंने,
हर इक सवाल में ज़िन्दगी मेरी उलझती चली गयी..."​
 
दिल के जख्मों को उनसे छुपाना पड़ा,
पलके भीगीं थी पर हमें मुस्कुराना पड़ा,
कैसे उल्टे हैं मुहब्बत के ये रिवाज?
रूठना चाहते थे पर उनको मनाना पड़ा......:tongue:
 
तेरे हर दुख को अपना बना लूँ..
तेरे हर गम को दिल सेलगा लूँ..
मुझे करनी आती नहीं चोरी वरना..
मैं तेरी आँखों से हर आँसू चुरालूँ......

जिंदगी जब गुनाहों का हिसाब माँगेगी |
अच्छे या बुरे किये का जवाब माँगेगी ||
आ ही जायेगा तेरा भी नाम बीच में |
जब वो मेरी चाहतो का हिसाब माँगेगी ||
 
ना जाने कितनी मोहब्बत थी उसकी नफरत में।
कि दुआओं से बेहतर थी बद् दुआ उसकी।।
 
हम भी फूलो की तरह अक्सर तन्हा ही रहते है |
कभी खुद से टूट जाते है कभी कोई तोड़ जाता है ||
 
मैं जज्बाता के दलदल में धंसता जा रह्या सूं
कहणा तो बहुत कुछ सै पर कह नही पा रह्या सूं

तू दिल पै अपणे हाथ धर के खुद तै जवाब दे
मैं जिकरा बार-बार किन बातां का ठा रह्या सूं

कोए और स्यामी होता तो कर लेता फैंसला
मुद्दत तै मैं तो अपणे आप तै टकरा रह्या सूं

तैने दर्द किते दिखे सै तो मलहम बणके लाग
ना तो फेर महफ़िल में मैं खूब मुस्कुरा रह्या सूं

ध्यान तै फूंक मारिये मेरे जख्मा पै बेचैन
मैं पह्ल्या ए दही के भ्रम में कपास खा रह्या सूं
 
दिल के जख्मों को उनसे छुपाना पड़ा,
पलके भीगीं थी पर हमें मुस्कुराना पड़ा,
कैसे उल्टे हैं मुहब्बत के ये रिवाज?
रूठना चाहते थे पर उनको मनाना पड़ा......:tongue:

wah wah kya baat hai....great...........
 
सर-ऐ बाज़ार निकलो तो आवारगी की तोहमत |
तन्हाई मैं बैठ जाओ तो इल्जाम - ऐ - मोहब्बत ||
 
न मेरे जख्म खिले हैं न तेरा रंग-ए-हिना |
मौसम आए ही नहीं अब के गुलाबों वाले ||
 
है सब नसीब की बातें खता किसी की नहीं
ये जि़दगी है बड़ी बेवफा किसी की नहीं।

तमाम जख्म जो अंदर तो चीखते हैं मगर
हमारे जिस्म से बाहर सदा किसी की नहीं।

वो होंठ सी के मेरे पूछता है चुप क्यों हो
किताबे-ज़ुर्म में ऐसी सज़ा किसी की नहीं।

बड़े-बड़े को उड़ा ले गई है तख्त केसाथ
चराग सबके बुझेंगे हवा किसी की नहीं।

'नज़ीर' सबकी दुआएं मिली बहुत लेकिन
हमारी मां की दुआ-सी दुआ किसी की नहीं।
 
एक लफ्ज़ मोहब्बत का अदना ये फ़साना है...
सिमटे तो दिल-इ-आशिक फैले तो ज़माना है...

आँखों में नमी सी है चुप चुप से वो बैठे हैं |
नाज़ुक सी निगाहों में नाज़ुक सा फ़साना है ||

ये इश्क नहीं आसान बस इतना समझ लीजे |
एक आग का दरिया है और डूब के जाना है ||

दिल संग-ए-मलामत का हर चन्द निशाना है |
दिल फिर भी मेरा दिल है दिल ही तो जमाना है ||

आंसू तो बहुत से हैं आँखों में जिगर लेकिन |
गिर जाए वो मोती है रह जाए सो दाना है ||

-जिगर मुरादाबादी
 
जिंदगी से यही गिला है मुझे |
कि तू बड़ी देर से मिला है मुझे ||

हमसफ़र चाहिए हुजूम नहीं |
एक मुसाफिर ही काफिला है मुझे ||

तू मोहब्बत से कोई चाल तो चल |
हार जाने का हौसला है मुझे ||
 
एक बार ही जी भर के सज़ा क्यूँ नहीं देते ?
मैं हर्फ़-ए-ग़लत हूँ तो मिटा क्यूँ नहीं देते ?

मोती हूँ तो दामन में पिरो लो मुझे अपने,
आँसू हूँ तो पलकों से गिरा क्यू नहीं देते ?

साया हूँ तो साथ ना रखने कि वज़ह क्या ,
पत्थर हूँ तो रास्ते से हटा क्यूँ नहीं देते ?
 
अजनबी बनके देख उसकी तस्वीर को,
याद रखने के सारे हुनर भूल जा।।
याद रख उसकी बातों के सब जायके,
उसके वादों की लज्ज़त मगर भूल जा।।
 
उस वक्त इन्तजार का आलम ना पूछिए |
जब कोई बार-बार कहे आ रहा हू मै ||
 
चली जाती है आए दिन वो ब्यूटी पार्लर में यूँ;*
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उनका मकसद है मिसाल-ए-हूर हो जाना;
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मगर यह बात किसी बेगम की समझ में क्यों नहीं आती;
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कि मुमकिन ही नहीं किसी किशमिश का फिर से अंगूर
हो जाना.
 
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