Shayri (Part 1)

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ढलने लगी थी सब, कि तू याद आ गया
फिर यूँ हुआ कि रात बड़ी देर तक रही

 
ये जो मेरे शहर में रोशनी लायें होंगे |
इन चिरागों ने ना जाने कितने घर जलाये होंगे ||

हाथ उनके भी यकीनन हुए होंगे जख्मी|
जिसने मेरी राह में कांटें बिछाये होंगे ||
 
मंजिलों की बात छोड़ो किस ने पायी मंजिलें,
इक सफ़र अच्छा लगा, इक हमसफ़र अच्छा लगा।
 
है शौक़-ए-सफ़र ऐसा, कि इक उम्र से हम ने
मंजिल भी नहीं पाई, रास्ता भी नहीं बदला
 
तमाशा रोज़ करते हो वफाओं का, जफ़ाओं का,
ज़रा ठहरो मेरे दिल में मोहब्बत सीख जाओगे
 
इस नगर मे लोग फिरते है मुखौटे पहन कर |
असल चेहरों को यहां पह्चानना मुमकिन नही ||
 
फ़क़त बयानबाजी से कोई समाधान नहीं होता
दो हाथ, दो पैर से कोई इन्सान नहीं होता

लहू उबलना चाहिए रगों में सैलाब की तरह
बाल पकने से कोई बूढ़ा,कोई जवान नहीं होता

नुक्कड़ों पे होती है ,खूब इल्म की बातें
सियासत से मज़हब तलक,क्या बयान नहीं होता

दिलों में रहमत हो, बस इतना ही काफी है
फ़ाके रखने से ख़ुदा मेहरबान नहीं होता

समंदर समेट ले मौजों को अपने ही आगोश में
न पूछ ,किस जिगर में यहाँ तूफ़ान नहीं होता
 
रात आँखों में गुजारी तो ये एहसास हुआ,
सुबह तक इक दीया किस तरह जलता होगा ...
 
हर एक पाँव मुझे रौंदते हुए गुजरे,
ना जाने कौन सी मंजिल का रास्ता हूँ मैं !!
 
कोई रिश्ता ना होता तो वो खफा क्यों होते |
ये बेरुखी उनकी मुहब्बत का पता देती है ||
 
मुझे मालूम नहीं खुशियों के मायने
पता बस ये है, हंसी उसकी मेरे चेहरे पे खिलती है !!
 
हमें तो अपनी ही सरकार ने लूटा
विदेशी ताकतों में कहाँ दम था|
रेल किराया भी बढा दिया
सिलेंडर, पैट्रोल क्या कम था ||
 
दिलों में आग लबों पर गुलाब रखते हैं
सब अपने चेहरों पे दोहरी नका़ब रखते हैं

हमें चराग समझ कर बुझा न पाओगे
हम अपने घर में कई आफ़ताब रखते हैं

बहुत से लोग कि जो हर्फ़-आश्ना भी नहीं
इसी में खुश हैं कि तेरी किताब रखते हैं

ये मैकदा है, वो मस्जिद है, वो है बुत-खाना
कहीं भी जाओ फ़रिश्ते हिसाब रखते हैं

हमारे शहर के मंजर न देख पायेंगे
यहाँ के लोग तो आँखों में ख्वाब रखते हैं
 
अभी ये ना पूछ कि मंजिल कहाँ है
अभी तो बस सफ़र का इरादा किया है।।
ना हारुँगा मैं हौसला ज़िन्दगी भर
ये किसी से नहीं, खुद से वादा किया है।।
 
कल न हम होंगे न कोई गिला होगा !
सिर्फ सिमटी हुई यादों का सिलसिला होगा !!
जो लम्हे हैं चलो हँस कर बिता ले !
जाने कल जिंदगी का क्या फैसला होगा !!
 
तेरी आँखों में आंसू थे मेरी खातिर .....
वोही इक लम्हा मुझे जिंदगी से पियारा लगा ..
​

ना रही कोई ओर तमन्ना उसके बाद |
भटकती किश्ती को तू ही किनारा लगा ||
 
तिशनगी जम गयी पत्थर की तरह होठों पर
डूब कर भी तेरे दरिया से मैं प्यासा निकला

तिशनगी = प्यास
 
अरसा बीता, ज़िन्दगी बीती, सब कुछ बीता, लेकिन फिर भी
जो इश्क में बीती, इश्क ही जाने, या वो जाने जिस पर बीती।
 
तुझको नहीं एहसास, कि ऐ दिल तेरी खातिर
एक शख्स बड़े काम का, बेकार हुआ है।।
 
दर्द की बिसात बिछा मुस्करा रहा है कोई |
मुस्करा कर देखो गम छुपा रहा है कोई ||
 
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