upendersingh
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delhi mai aadee log yadavo ko jaat samajhte hai...
हां भाई, ये बात तो मैंने भी नोट की है. मेरे ऑफिस में एक बिहारी चपरासी है, जो एक गुर्जर के मकान में किराए पर रहता है. वो एक दिन बता रहा था कि अगर किराया लेट कर दूं तो मकान मालिक की आंखें लाल हो जाती हैं. ये जाट सब ऐसे ही होते हैं. तो मैंने पूछ लिया कि तेरा मकान मालिक जाट है क्या...तो उसने बताया कि नहीं गुर्जर है, लेकिन ये गुर्जर जाट ही तो होते हैं...मुझे बड़ी हंसी आई, हालांकि इस तरह का ये पहला मौका नहीं था...मैंने दर्जनों बार पहले भी इस तरह की बातें सुनी हैं. यादवों को भी जाट कह देते हैं लोग...लेकिन जाट को कोई भी यादव या गुर्जर नहीं कहता, हालांकि राजपूत तो कह देते हैं कुछ लोग...
यादवों/गुर्जरों/राजपूतों में भी ऐसे लोग होते हैं, जो जिंदगी से परेशान होते हैं. जब कोई अपनी जिंदगी से परेशान होता है तो वो सबसे पहले अपने देश, अपने धर्म, अपनी जाति को कोसना शुरू कर देता है. मैं सोचता हूं कि जाटों को नीचा दिखाने के लिए किसी को कोई सबूत नहीं मिलता, लेकिन जब जिंदगी से परेशान कोई गुर्जर/यादव/राजपूत अपनी जाति को कोसना शुरू करता होगा तो उसके बिरादरी भाईयों का क्या हाल होता होगा. राजपूत तो भले ही थोड़ा सा बच जाते होंगे, क्योंकि उनमें 2 प्रधानमंत्री भी हुए हैं और ध्यानचंद जैसा महान खिलाड़ी भी हुआ है, साथ ही उनका एक इतिहास भी है (हालांकि जाटों के सामने तो अब वे भी कहीं नहीं ठहरते), लेकिन इन गुर्जरों/यादवों का क्या होता होगा...
किसी भी राज्य/क्षेत्र को गुर्जर/यादव लैंड नहीं कहा जाता...इनमें कोई भी विश्व चैंपियन पहलवान या क्रिकेटर नहीं हुआ...इनमें कोई भी देश का प्रधानमंत्री नहीं हुआ...हरियाणा/पंजाब के जाटों को गेंहू/धान उगाने वाला और उत्तर प्रदेश के जाटों को गन्ना उगाने वाला किसान माना जाता है, लेकिन गुर्जर/यादवों की ऐसी कोई छवि नहीं है...ना फ़ौज में इनकी कोई रेजिमेंट है...राजस्थान में कुछ साल पहले आरक्षण की मांग कर रहे लगभग सैकड़ों गुर्जर गोलियों से भून दिए गए थे...यू.पी. की राजनीति में यादवों/राजपूतों की भले ही थोड़ी पूछ हो, लेकिन गुर्जरों को कोई नहीं पूछता...डी.एल.एफ. का मालिक कुशलपाल सिंह, जो फिलहाल देश का 12वें नंबर का सबसे अमीर व्यक्ति है, वो देश के सारे गुर्जरों/यादवों/राजपूतों को अकेला ही खरीद लेगा और इसके बाद भी उसके पास काफी धन बचा रहेगा...बदमाशी का जहां तक सवाल है तो उसमें यादव/राजपूत तो कहीं भी नहीं हैं, गुर्जर हैं कुछ हद तक, लेकिन जाट बहुल क्षेत्रों में जाटों के सामने तो वे भी कहीं नहीं ठहरते...गुर्जर की छवि एक चोर-उचक्के की है, यादव की छवि मुस्लिम समर्थक की है...हालांकि गुर्जरों की तुलना में यादवों की छवि फिर भी ठीक है...दिल्ली/एन.सी.आर. में जमीन के अधिग्रहण के बाद कुछ गुर्जरों/यादवों के पास भले ही कुछ पैसा आ गया हो, लेकिन इनकी एक बड़ी तादाद, जो दिल्ली/एन.सी.आर. में नहीं रहती, वो बेहद गरीब और दबी-कुचली है. मैंने दिल्ली में बहुत से गुर्जर/यादव/राजपूत बीड़ी/सिगरेट/मूंगफली बेचने वाले, चपरासी, फैक्ट्रियों में गाली खाकर नौकरी करने वाले, झुग्गी-झोंपड़ी में रहने वाले दबे-कुचले देखे हैं और सही कहूं तो जाट नहीं देखे...खराब दौर से गुजर रहे जाट जरूर देखे हैं, जो अपनी मेहनत से जल्द ही संभल गए...
बतौर भारतीय और हिंदू गुर्जर/यादव/राजपूत मुझे बेशक अपने भाई लगते हैं, लेकिन जब इनमें से कुछ लोग जाटों को नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं तो फिर गुस्सा आने लगता है...क्योंकि ये मेहनत में जाटों के जैसा बनने का प्रयास करने के बजाय जाटों को अपमानित करने का असफल प्रयास करने लगते हैं.